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ब्लॉग

माई नेम इज खान...जीशान खान

एक भारतीय कंपनी का मुस्लिम युवक का नौकरी का आवेदन खारिज करने का फैसला भारतीय समाज में पसरी हुई बहुसंख्यकवाद मानसिकता की खबर देता है. ये भी साफ है कि देश अब भी एक कदम आगे और दो कदम पीछे चल रहा है.

अफसोस और चिंता तो बेशक सभी को है कि इस देश में कॉरपोरेट संस्कृति के विस्तार के नाम पर ये कैसा रवैया बना हुआ है. हिंदी सिनेमा के मशहूर एक्टर शाहरुख खान की एक फिल्म “माई नेम इज खान” में खान नाम के किरदार को अमेरिकी वीजा न देने का दृश्य है. लगता है वास्तविक दुनिया में जीशान खान को नौकरी न देना उस सिने दृश्य का ही एक विस्तार है. बस फर्क यही है कि जीशान के साथ जो हुआ वो असल जिंदगी में है. और आप जीशान की जगह किसी इमरान को रख लीजिए तो ऐसे कितने लोग होंगे जिन्हें नौकरी तो दूर किराए पर घर भी नहीं मिलते सिर्फ इसलिए कि वे मुस्लिम हैं.

नौकरी, मकान, वीजा, सम्मान, सुरक्षा और पहचान....ये अस्मिता और बुनियादी जरूरतों के प्रश्न हैं जो एक साथ भारतीय समाज के रवैये से टकराते रहे हैं. मुस्लिम होना एक संदेहजनक स्थिति बना दिया गया है. और मुस्लिम के खिलाफ ग्रंथि जड़ें जमा चुकी हैं. वरना हीरों की उस जानीमानी कंपनी का वैसा जवाब जीशान को न आता जिसे वो अब अपनी चूक बता रही है और चूक भी किसी इंटर्न की. तो क्या वो इंटर्न जवाब देने की पोजीशन में बैठाया गया था या उसने शरारत की. या उसका जेहन ही इतना कमजोर था या कंपनी का ये सिर्फ बहाना है. लिहाजा जांच तो की ही जानी चाहिए. जिसका भरोसा महाराष्ट्र सरकार, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग और अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय राज्य मंत्री ने दिलाया है. लेकिन नागरिक के तौर पर जीशान की जो तौहीन हुई है उसकी भरपाई भी कंपनी और सरकार को करनी चाहिए.

जीशान का मामला भारत की इन छोटी बड़ी कंपनियों के रवैये को भी दिखाता है. वे बड़े कॉरपोरेट भले न हो लेकिन मुनाफा खूब कमा रहे हैं और ये कंपनी तो पिछले साल ही अपने चुनिंदा कर्मचारियों को अद्भुत बोनस देकर ख्याति भी बटोर चुकी थी. इतना बड़ा कारोबार होने के बावजूद उसके लिए एक 22 साल के योग्य और उपयुक्त उम्मीदवार का आवेदन उसके धर्म की बिना पर खारिज करना कितना आसान था. अपने माफीनामे में कंपनी ने ये लचर सी दलील भी दी कि उसके यहां 61 में से एक कर्मचारी मुसलमान है.

ये आंकड़ा भी भयावह इशारे करता है. एक इशारा तो यही है कि मुस्लिम कर्मचारियों की संख्या निजी क्षेत्र में नगण्य है. इसमें मुस्लिम विरोधी ग्रंथि की बू आती है और ये भी पता चलता है कि मुस्लिम समाज की अंदरूनी स्थिति कितनी चिंताजनक है जहां शिक्षा और जागरूकता का अभाव कायम है. एक इशारा इसमें ये भी है जो सवाल की शक्ल अख्तियार कर लेता है कि पब्लिक सेक्टर में और सरकारी नौकरियों में मुस्लिमों की उपस्थिति का आंकड़ा क्या है. अगर आप इन आंकडों को विभागवार और विषयवार देखने निकलेंगे तो आपको सेक्युलर देश के एक निर्मम और संवेदनहीन यथार्थ का एक नजारा तो मिल ही जाएगा.

कंपनी तो सवालों के घेरे में आ गई है लेकिन जरा सरकार भी तो बताए उसके पास मुस्लिमों का क्या प्रतिनिधित्व है. तमाम सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं की लिस्ट बनाए और उसमें काम कर रहे लोगों के बारे में पता करे. कितने मुसलमान हैं. असल में अल्पसंख्यक मंत्रालय एक पर्दा है और आयोग भी एक बड़ा पर्दा ही है जो इस देश में आज से नहीं कांग्रेस की सरकारों के जमाने से, आजादी के समय से हमारे जेहन और विचार और रवैये पर पड़ा हुआ है. भारत में नौकरियों में जाति और धर्म वाले भेदभाव होते रहे हैं. यह मामला इस मुद्दे पर संवेदनहीनता का भी लगता है. भारत की पारंपरिक कंपनियां बड़ी तो हो रही हैं लेकिन कॉरपोरेट चरित्र अपनाने में विफल हैं और लगता है कि मुख्य रूप से परिवार, जाति, धर्म के दायरों में अटकी पड़ी हैं.

इस मामले से तो लगता है कि किसी को संविधान की परवाह भी नहीं रह गई है. डर तो छोड़ ही दीजिए. जीशान आधुनिक पीढ़ी का एक सजग और सचेत युवक है. हीन भावना या अन्य किसी डर में आने के बजाय उसने हिम्मत दिखाई और पूरे देश में सवाल खड़ा कर दिया. इस सवाल पर सब मुंह चुरा रहे हैं. और फिर कहते हैं दुनिया में भारत का डंका बज रहा है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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