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विज्ञान

मां से मिलता है तनाव

कहते हैं महाभारत में अभिमन्यु ने मां की कोख में ही चक्रव्यूह भेदना सीख लिया था. कहानी पर कोई यकीन करे न करे, लेकिन धीरे धीरे यह बात पुख्ता होती जा रही है कि गर्भ के दौरान ही शिशु बहुत कुछ सीख लेता है, तनाव भी.

गर्भ में ही बच्चा माता पिता की आवाज पहचानने लगता है, उनके शब्दों को समझने लगता है. खास तौर से गर्भावस्था के दौरान मां के मूड का बच्चे की जिंदगी पर गहरा असर पड़ता है. बच्चा कितना स्वस्थ होगा या उसे कैसी बीमारियां होंगी, काफी कुछ गर्भ के दौरान ही तय हो जाता है. यदि मां तनाव में हो तो वह बच्चे तक भी पहुंचता है.

तनाव कभी भी हो सकता है और इसके पीछे जाने अंजाने कई कारण हो सकते हैं. अक्सर समय से पहले होने वाली डिलीवरी में डॉक्टर हार्मोन के जरिए गर्भ में ही शिशु के फेफड़ों विकसित कर देते हैं. लेकिन इससे शिशु तनाव में आता है. रिसर्चरों को आशंका है कि कोख में तनाव का शिकार होने वाले बच्चों में उम्र बढ़ने के साथ अल्जाइमर, डायबिटीज और स्ट्रोक का खतरा ज्यादा रहता है.

बेचैन और घबराए बच्चे

जर्मनी की येना यूनिवर्सिटी में इस पर रिसर्च चल रहा है. ब्रेन ऐज प्रोजेक्ट में अब तक 80 बच्चों का परीक्षण किया जा चुका है. इनमें से आधे बच्चे गर्भ में तनाव का सामना कर चुके हैं, जबकि 40 बच्चों को ऐसी कोई शिकायत नहीं रही.

प्रोजेक्ट हेड मथियाज श्वाब बच्चों को एक कहानी का शुरुआती हिस्सा सुनाते हैं. इसके बाद उनसे कहानी खत्म करने को कहा जाता है. इस दौरान मस्तिष्क विज्ञानी कहानी को लेकर बच्चों से कई पेंचीदा सवाल भी करते हैं. सवाल तब तक किए जाते हैं जब तक बच्चा चुप न हो जाए. इस दौरान ईईजी मशीन बच्चे के तनाव को दर्ज करती है. ग्राफ से पता चलता है कि कठिन सवालों के साथ बचचे का ब्लड प्रेशर भी बढ़ने लगता है, उसकी धड़कनें तेज होने लगती हैं. 

मथियास श्वाब इस बारे में बताते हैं, "ऐसे बच्चे जिन्होंने गर्भ में तनाव महसूस किया है, परीक्षण के लिए आते समय ही तनाव से घिरे रहते हैं. ऐसा नहीं है कि यहां आ कर उनका तनाव बढ़ जाता है." श्वाब बताते हैं कि ऐसे बच्चे ज्यादा बेचैन और घबराए हुए भी रहते हैं, उनकी एकाग्रता भी कम होती है, वे पैरों को हिलाते हैं. वे शांति से नहीं बैठ पाते.

Schwangerschaft - Arbeiten

तनाव की वजह से कोख में पल रहे बच्चे को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिलते.

गर्भ में ही तय बुढ़ापा

अगले चरण में वैज्ञानिक यह देखना चाहते हैं कि क्या दोनों समूहों के बच्चों के दिमाग के ढांचे और जैविक उम्र में कोई अतंर है. ऐसी आशंका है कि गर्भ में तनाव का अनुभव कर चुके बच्चों का शरीर समय से पहले उम्रदराज होने लगता है.

कुछ प्रयोग इंसानों पर नहीं किए जा सकते, इसीलिए कुछ गर्भवती भेड़ों को लैब में लाया गया है. इन्हें हफ्ते में दो बार, 3 घंटे तक बिलकुल अकेला कर दिया जाता है. तनाव की वजह से गर्भवती भेड़ में जो हार्मोन पैदा हुए, वे शिशु के खून में भी बहने लगते हैं. रिसर्चरों ने नाभि में हो रहे खून के बहाव की भी जांच की. ग्राफ बताता है कि रक्त प्रवाह 30 फीसदी गिरा, जिसका मतलब है कि कोख में पल रहे बच्चे को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिले.

इसी तरह चूहों पर भी टेस्ट किए जा रहे हैं. चूहों का जीवनकाल बहुत छोटा होता है. इसीलिए उन पर यह जांच की जा रही है कि गर्भधारण के वक्त हुए तनाव के नतीजे बुढ़ापे में कैसे सामने आते हैं. पता चला है कि गर्भ में तनाव में रह चुके चूहों को बुढ़ापे में ज्यादा और ताकतवर दौरे पड़ते हैं.

ब्रेन ऐज प्रोजेक्ट से जुड़े दूसरे वैज्ञानिक जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या गर्भ में तनाव झेलने वाले शिशु की बीमारियां आनुवांशिक ढंग से तो आगे नहीं बढ़ती. इस पर यूरोप और अमेरिका के कई रिसर्चरों की टीमें मिलकर काम कर रही है. प्रयोग सफल रहे तो कई लोग बुढ़ापे में काफी हद तक स्वस्थ जीवन बिता सकेंगे.

रिपोर्ट: ओंकार सिंह जनौटी

संपादन: ईशा भाटिया

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