1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

विज्ञान

मांस की खपत कम करने की मांग

मांसाहारी खाने के शौकीनों को शायाद ही यह बात पता हो कि दुनिया का 40 फीसदी से ज्यादा खाने लायक अनाज और एक चौथाई पीने लायक पानी इन जानवरों को पालने में खर्च होता है. इसी के चलते मांस की खपत कम करने की मांग की जा रही है.

पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाले समूहों ने मांग की है कि यूरोपीय संघ मांस के व्यवसायिक उत्पादन और उसकी खपत कम करने के लिए कदम उठाये. ये समूह आगाह कर रहे हैं कि एशिया और अन्य विकासशील देशों में मांस की बढ़ती मांग से भविष्य में "विनाशकारी" परिणाम हो सकते हैं.

कृषि सब्सिडी में बदलाव

जर्मनी की ग्रीन पार्टी से जुड़े हुए 'फ्रेंड्स ऑफ दि अर्थ' और 'हाइनरिष बोएल फाउंडेशन' का कहना है कि व्यवसायिक स्तर पर मांस का उत्पादन करने के तरीके टिकाऊ नहीं हैं. इस वजह से उपभोक्ताओं की सेहत, पर्यावरण और विश्व खाद्य सुरक्षा का लक्ष्य प्रभावित हो रहे हैं. इस समूह ने यूरोपीय संघ से अपील की है कि कृषि में सब्सिडी देने की प्रक्रिया में कुछ बदलाव लाए जाएं.

ईयू के कुल खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा इसी सब्सिडी में जाता है. कृषि सब्सिडी का मकसद छोटे स्तर पर टिकाऊ तरीके से खेती करने वालों की मदद करना है. लेकिन इसका फायदा ऐसे व्यवसायी भी उठाते आये हैं जो बड़े स्तर पर जानवरों को पालते हैं और उनसे कई चीजों का उत्पादन करते हैं.

कम खाएं मांस

इस समूह ने यह मांग भी की है कि मांस के थैलों पर साफ साफ लेबल लगाकर लिखा जाए कि वे कहां से आए हैं, उनकी फार्मिंग कहां हुई है. इसके साथ साथ यह मांग भी की है कि ईयू अपने सभी नागरिकों को कम मात्रा में और बेहतर क्वालिटी का मांस खाने के निर्देश जारी करे. 'फ्रेंड्स ऑफ दि अर्थ' के आद्रियान बेब कहते हैं, "पूरी दुनिया के लोगों के लिए संभव नहीं है कि वे जानवरों से मिलने वाले उत्पादों का उतना ही इस्तेमाल कर पाएं जितना हम यूरोप और अमेरिका में करते हैं."

हाइनरिष बोएल फाउंडेशन के बास्तिआन हेरमिसॉन साफ करते हैं कि वे ऐसा नहीं कह रहे कि मांस खाना बिलकुल बंद कर दें, बल्कि उनका संगठन सिर्फ उपभोक्ताओं को शिक्षित करना चाहता है कि वे सोच समझ कर अपना खाना चुनें.

एशिया में बढ़ेगी मांग

समूह ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि हर ईयू नागरिक ने 2010 से 2012 के बीच हर साल औसतन 64.2 किलो पशु, मवेशी और मुर्गियों का मांस खाया. अमेरिका में यह संख्या 92 किलो थी.

रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि यह संख्या अगले दस सालों तक स्थिर रहने वाली है. लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि एशिया और अन्य तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में मांस और डेयरी उत्पादों की मांग में 2022 तक करीब 80 फीसदी का उछाल देखने को मिलेगा. इस तरह की मांग को पूरा करने के लिए 2050 तक विश्व भर में मांस के वार्षिक उत्पादन को अभी के 30 करोड़ टन से बढ़ाकर 47 करोड़ टन के स्तर तक लाना होगा.

घटती जैव विविधता

वर्तमान व्यवस्था में दुनिया का 40 फीसदी से ज्यादा खाने लायक अनाज जानवरों को खिलाया जाता है. साथ ही एक चौथाई पीने लायक ताजा पानी भी इन पशुओं को पालने में खर्च होता है. व्यवसायिक स्तर पर मांस का उत्पादन करने में जानवरों को बहुत सी दवाएं भी दी जाती हैं जिनका उन पर और उनके मांस पर बुरा असर हो सकता है. इससे जैव विविधता भी घट रही है क्योंकि सिर्फ कुछ ही प्रजाति के जानवरों की उनके मांस के लिए पूरी दुनिया में मांग है.

समूह ने इस बात की भी आशंका जताई है कि अमेरिका के साथ मुक्त व्यापार समझौता हो जाने पर ईयू और अमेरिका में मांस उत्पादन के स्तर में गिरावट आएगी. समूह का प्रस्ताव है कि इन दोनों पक्षों के बीच बातचीत तुरंत बंद की जानी चाहिए.

आरआर/आईबी (डीपीए)

DW.COM

संबंधित सामग्री