′महिलाओ यहां डर कर रहो′ | ब्लॉग | DW | 19.03.2013
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ब्लॉग

'महिलाओ यहां डर कर रहो'

वह एक विदेशी पर्यटक थी, जिसे 'अतिथि देवो भवः' के नारे ने लुभाया. पैसे बचाकर वह आखिरकार प्रेम का प्रतीक ताजमहल देखने भारत आईं. लेकिन यहां पहुंचकर उन्हें पता चला कि महिलाओं के लिए इसी धरती पर नर्क भी है.

अगर आप एक किशोरी या युवा महिला हैं और भारत में हैं, तो सावधान हो जाइये. आपका शरीर भोग की एक वस्तु हैं. जिसके पास पैसा है वो आपके शरीर को खरीदने की कोशिश करेगा. जिसके पास पद है वो आपको आगे बढ़ाने के सपने दिखाएगा. जिसके पास ये कुछ भी नहीं, हो सकता है कि वो शारीरिक बल का सहारा ले. हालांकि सिर्फ आखिरी तरीका अपनाने वाला ही कानूनन बलात्कारी कहा जाएगा. बाकी तरीके वैध माने जाने लगे हैं, उन्हें विलासिता, पद और सफलता का एक आयाम बना दिया गया है.

इसमें कोई शक नहीं कि 16 दिसंबर की रात दिल्ली में छात्रा से हुए सामूहिक बलात्कार ने भारतीय समाज को झकझोरा. अचानक महिलाओं की कोख से जन्मे पुरुष प्रधान समाज को लगा कि इस भीड़ में न तो उनकी बेटी सुरक्षित है, न ही उनकी बहन. सुरक्षा का एक मात्र जरिया यही है कि महिलाएं डरपोक बनी रहें. रात में आफत भी आ जाए तो घर से बाहर न निकलें. बस, ट्रेन या टेम्पो में कोई छेड़े तो वहां से दूर हो जाएं. घरवालों के ताने सुनें कि वहां जाने की जरूरत ही क्या थी. बदतमीजी हो तो किसी को कुछ न बताएं, खामोश रहें. शिकायत की, तो हो सकता है कि घर का कोई सदस्य लड़ने चला जाए. आप इस आशंका से थरथरा उठें कि खूनखराबे में कुछ अनहोनी हो गई तो उसकी जिम्मेदारी आपकी ही होगी.

वैसे तो भारत में पुरुष भी पुलिस पर बहुत कम विश्वास करते हैं लेकिन महिलाओं के मामले में ये भरोसा तो और भी टूटा हुआ है. पुलिस के प्रति महिलाओं का इस मनोदशा तक पहुंचना वाजिब भी है. अखबारों में अक्सर थानों में महिलाओं से बलात्कार की खबरें छपती रहती हैं. थानों में पुलिसकर्मी अपने मनोरंजन के लिए भी उनसे काफी कुछ पूछते हैं. मसलन कैसे छेड़ा, क्या कहा, कहां छुआ. इसके बाद उनके चेहरे पर गंभीरता की जगह एक जिज्ञासा होती है. कुछ पुलिसकर्मियों की आंखें पीड़ित महिला का चरित्र चित्रण करने लगती हैं.

जो पुलिसकर्मी गंभीरता से अपना काम करेगा, हो सकता है कि उसे इधर उधर से आने वाले कई फोनों का सामना करना पड़े. वार्ड मेम्बर से लेकर जिला पंचायत सदस्य या फिर विधायक से सांसद तक उसे समझाने की कोशिश करने लगें. अगर ऐसा न हुआ तो भी उस पुलिसकर्मी को केस खत्म होने तक हर दिन कोर्ट के चक्कर काटने पड़ेंगे. जीप अगर साहब ले गए तो उसे संकोच करते हुए किसी की मोटरसाइकिल मांगनी पड़ेगी. अपनी जेब से ढीली कर तेल भराना होगा. पैसा मिलेगा लेकिन महीनों बाद, पूरा हिसाब किताब देने पर. केस के दौरान इस पुलिसवाले का ट्रांसफर किसी भी जगह हो जाए, उसे तारीख लगने पर कचहरी आना पड़ेगा. वो रिटायर भी हो जाए तो भी उसके चक्कर लगते रहेंगे. आए दिन ठुल्ला या चोर जैसे ताने सुनने के बाद जब उसकी जिंदगी का लंबा हिस्सा गुजर चुका होगा तो शायद उसकी पत्नी भी कहेगी कि हर वक्त घर से बाहर रहे, अब बच्चों को क्यों कोसते हो, कभी ध्यान दिया उन पर.

इन सब द्वंद्वों के बीच मामला कचहरी पहुंचेगा. आए दिन पेशी, वकील से मुलाकात, खर्चा-पानी, इन सब का ध्यान रखना होगा. दूसरी कचहरी में मामला अलग ढंग से चलेगा, समाज की कचहरी बिना जिरह या वकील के फैसला कर देगी. पीड़ित को एक झूठन करार दिया जाएगा. तथाकथित सभ्य समाज उसे दूरी बनाने लगेगा. बच्चियों की नई पीढ़ी को उस महिला का उदाहरण देते हुए बताया जाएगा कि ज्यादा इतराने पर उनकी भी वैसी ही हालत होगी, इसीलिए चुपचाप बैठो और भारत में महिला होने की गुलामी स्वीकार करो.

ब्लॉगः ओंकार सिंह जनौटी

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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