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दुनिया

महिलाओं पर हाजी अली की पाबंदी हटी

मुंबई में हाजी अली की दरगाह में महिलाओं पर लगी रोक को हटाने के बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसले को ऐतिहासिक माना जा रहा है. इससे पहले इसी अदालत ने महिलाओं को महाराष्ट्र के शनि मंदिर के गर्भगृह तक जाने की अनुमति दी थी.

लैंगिक भेदभाव के आधार पर महिलाओं को कहीं भी जाने से रोकना भारत के संविधान के खिलाफ और हर व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है. हाई कोर्ट ने शुक्रवार को दिए अपने फैसले में हाजी अली दरगाह में महिलाओं को दरगाह की मजार तक जाने पर लगी पाबंदी हटा ली. जस्टिस वीएम कनाडे ने फैसला सुनाते हुए कहा, "महिलाएं हाजी अली दरगाह के अंत:गृह में प्रवेश कर सकती हैं और राज्य सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि वे सुरक्षित रहें."

मुंबई के हाजी अली ट्रस्ट ने 2012 से इस विख्यात दरगाह के भीतर रखी संत की कब्र तक जाने से महिलाओं को रोक दिया था. ट्रस्ट इसे इस्लाम की नजर में "गुनाहे-अजीम" बताता था. हाजी अली दरगाह ट्रस्ट ने कहा है कि वह हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगा. ट्रस्ट की ओर से दायर याचिका के कारण ही कोर्ट ने अपने इस आदेश पर छह हफ्ते के लिए रोक लगा दी है.

देश में लैंगिक बराबरी के मुद्दों पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं ने इस फैसले का स्वागत किया है. भारत भर में कई जगहों पर स्थित हिंदू मंदिरों में महिलाओं को प्रवेश से रोकने वाले कई प्रतिबंधों को तोड़ने के अभियान चल रहे हैं. जनवरी 2016 में महाराष्ट्र के ही शनि मंदिर के बाहर बड़े विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके बाद अप्रैल में मुंबई के हाई कोर्ट ने पाबंदी को हटाने का आदेश दिया था. अभी भी सबरीमाला मंदिर में लगी पाबंदी को हटवाने के लिए संघर्ष जारी है.

शनि मंदिर अभियान का नेतृत्व करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता तृप्ति देसाई ने कहा, "हर जगह अपने अधिकारों के लिए लड़ रही महिलाओं के लिए यह फैसला बड़ी जीत है. हाई कोर्ट ने पूजा की जगहों में भी लैंगिक बराबरी और बराबर अधिकार दिलाए हैं."

हाजी अली दरगाह मामले में याचिकाकर्ता जाकिया सोमन ने इसे पूरे देश की महिलाओं और "आम मुसलमान महिलाओं की जीत" बताते हुए फैसले पर संतोष जताया है.

सवा अरब की आबादी वाले भारत में करीब 80 फीसदी लोग हिंदू हैं, लेकिन यह मुसलमानों, ईसाइयों, बौद्धों और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों के बहुत से लोगों का भी घर है.

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