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दुनिया

महिलाओं का सहारा सरकारी मदद

जर्मनी में नए आंकड़े बता रहे हैं कि मर्दों के मुकाबले ज्यादा औरतें अपना गुजारा सिर्फ काम से मिले वेतन से नहीं कर पाती. उन्हें नौकरी करने के बावजूद परिवार चलाने के लिए सरकारी मदद लेनी पड़ती है.

मजदूर संगठनों के करीबी माने जाने वाले हंस बोएक्लर फाउंडेशन के आर्थिक और सामाजिक संस्थान से जारी आंकड़ों के जरिये यह बात पता चली है. पिछले साल के शुरू में सवा 13 लाख कामगारों को पगार के अलावा बेरोजगारी भत्ता लेना पड़ा क्योंकि काम से उनकी आमदनी जीवनयापन के लिए पर्याप्त नहीं थी. इन सवा 13 लाख लोगों में सवा 7 लाख महिलाएं और 6 लाख पुरुष थे.

2007 के मुकाबले मासिक आमदनी के बावजूद सरकारी मदद लेने के लिए मजबूर महिलाओं की संख्या 26 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि इस तरह मर्दों की तादाद सिर्फ 17 प्रतिशत ज्यादा हुई है. शोध संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार 2007 में सरकारी मदद लेने वाला हर पांचवा इंसान नौकरी कर रहा था, जबकि पांच साल बाद हर तीसरा नौकरी करने के बावजूद सरकारी मदद ले रहा है.

हालांकि पिछले सालों में काम करने वाली महिलाओं की तादाद बढ़ी है, लेकिन आर्थिक और सामाजिक शोध संस्थान की रिसर्चर क्रिस्टीना क्लेनर का कहना है, "महिलाओं में तेजी से बढ़ी रोजगार दर कामयाबी का कहानी का एक हिस्सा मात्र है." जर्मनी की महिलाएं कम वेतन वाले सेक्टर के प्रसार से व्यापक रूप से प्रभावित हैं. क्लेनर के मुताबिक, "दूसरी ओर यह आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि अकेले बच्चे पालने वालों में ज्यादातर महिलाएं हैं." रिपोर्ट के अनुसार अकेले परिवार चलाने वाली नौकरीशुदा महिलाओं का 14 प्रतिशत पश्चिमी जर्मनी में और 26 प्रतिशत पूर्वी जर्मनी में सरकारी मदद ले रहा था.

सिंगल के मुकाबले बच्चों की अकेले परवरिश करने वालों को सरकारी मदद पर ज्यादा निर्भर करना पड़ता है, क्योंकि उन्हें अपने अलावा बच्चों को भी पालना पोसना होता है. इसी तरह पार्टनर के साथ रहने वाले लोगों को अकेले परिवार चलाने वालों की तुलना में सरकारी मदद की कम जरूरत होती है. इसलिए भी कि उन्हें सरकारी मदद के नियमों के अनुसार एक दूसरे की मदद करनी पड़ती है.

पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के ज्यादा सरकारी अनुदान पर निर्भर होने की वजह मिनी जॉब सेक्टर का प्रसार है. पूरे समय के बदले आंशिक काम करने वालों में  महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा है.

एमजे/एनआर (डीपीए)

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