1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य में हुआ सुधार

संयुक्त राष्ट्र समर्थित सर्वेक्षण के शुरूआती नतीजों के अनुसार बीते दशक में भारत की महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य में काफी सुधार हुए हैं.

सर्वे के मुताबिक सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े माने जाने वाले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों में कमजोर और कुपोषित बच्चों की संख्या में अन्य जातियों की तुलना में ज्यादा तेजी से गिरावट देखी गई. स्वास्थ्यकर्मी इसका श्रेय स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए समुदायिक कार्यकर्ताओं के उपयोग किए जाने जैसे सरल हस्तक्षेपों और सरकार द्वारा बुनियादी स्वास्थ्य अभियानों पर दिए जा रहे जोर को दे रहे हैं. ये अभियान शिशुओं और बच्चों को पौष्टिक खानपान मिलने और बच्चों का जन्म अस्पतालों में करवाने पर बल देते हैं. यूनिसेफ द्वारा समर्थित और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा कराया गया यह सर्वे पिछले एक दशक में भारत में जच्चा बच्चा स्वास्थ्य पर कराया गया पहला राष्ट्रीय सर्वेक्षण है. इसके निष्कर्षों को अभी सरकार द्वारा मान्यता दिया जाना बाकी है.

"आशा" की किरण

पिछले दशक में सरकार ने गांवों में "आशा" नाम का कार्यक्रम शुरू किया. इस कार्यक्रम के तहत गांवों में प्रशिक्षित महिला स्वास्थ्यकर्मियों को नियुक्त किया जाता है. इन महिलाएं को "आशा" के नाम से जाना जाता है और वे गर्भवती महिलाओं और नई माताओं को प्रसव के पहले और बाद में स्वास्थ्य संबंधी सलाह देती हैं. सरकार ने कई मुफ्त योजनाएं लागू की हैं जिनमें गर्भवती महिलाओं और बीमार नवजात शिशुओं को अस्पताल आने जाने की नि:शुल्क सेवाएं शामिल हैं.

शहरी और ग्रामीण भारत के एक लाख से अधिक घरों से एकत्रित किए गए इन आंकड़ों के मुताबिक 2013/14 में पांच साल से कम उम्र के ऐसे बच्चों की संख्या गिर कर 39 प्रतिशत हो गई, जिनका विकास ठीक तरह से नहीं हो रहा. 2005/6 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में यह आकड़ा 48 प्रतिशत था. बाल कुपोषण दुनिया भर में सालाना तीन लाख बच्चों की मौत का कारण है जो कि कुल बाल मौतों का आधा हिस्सा है. ज्यादातर बच्चे कमजोर प्रतिरोधी क्षमता की वजह से दस्त जैसी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं जिनसे आसानी से बचा जा सकता है.

घट रही हैं असमानताएं

रिपोर्ट के बारे में यूनिसेफ इंडिया में बाल विकास एवं पोषण की प्रमुख सबा मेब्राह्टू कहती हैं, "इसका मतलब है कि असमानताएं घट रही हैं और पिछड़े वर्गों को दी जा रही सामाजिक सुरक्षा तंत्र और अतिरिक्त सहायता कारगर साबित हो रही हैं.” जिन बच्चों को छह महीने की उम्र तक सिर्फ मां का दूध पिलाया गया उनकी संख्या 46 प्रतिशत से बढ़कर 65 प्रतिशत तक पहुंच गई. दो साल की उम्र तक पूरी तरह से इम्यून बच्चों की संख्या 65 प्रतिशत पाई गई. मेब्राह्टू बताती हैं, "मां का दूध विशेष रूप से नव प्रसव मृत्यु दर को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है. इसका बच्चे के विकास और पूरे स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है. यह बच्चे को सबसे अच्छी शुरुआत देता है. इसे हम बच्चे के लिए पहला टीका बुलाते हैं.”

हालांकि इस सर्वेक्षण में किशोरियों के पोषण की स्थिति में कोई सुधार देखने को नहीं मिला. 15 और 18 के बीच की आयु में 44 प्रतिशत लड़कियों का बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) कम पाया गया जो कि लगभग एक दशक पहले से अपरिवर्तित है. सर्वेक्षण के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु में विवाहित होने वाली महिलाओं की संख्या 30 प्रतिशत तक गिर गई. 2005/06 में यह आंकड़ा 47 प्रतिशत था. क्लीनिक या अस्पताल में जन्म देने वाली महिलाओं की संख्या 41 प्रतिशत से 79 प्रतिशत तक पहुंच गई है.

एपी/आईबी (रॉयटर्स)

DW.COM

संबंधित सामग्री