महाराष्ट्र में हिंसा, क्यों भड़का दलित समुदाय | दुनिया | DW | 03.01.2018
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दुनिया

महाराष्ट्र में हिंसा, क्यों भड़का दलित समुदाय

पहली जनवरी को पुणे के पास स्थित भीमा-कोरेगांव में भड़की जातीय हिंसा की आग अब महाराष्ट्र के अन्य इलाकों तक पहुंच गई है. दलितों ने 3 जनवरी को राज्य बंद का आह्वान किया. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शांति की अपील की है.

पिछले दो दिनों से महाराष्ट्र के पुणे और आसपास के क्षेत्र में फैली हिंसा की लपटें अब मुंबई तक पहुंच गई है. राज्य में कुछ दलित संगठनों ने बुधवार को महाराष्ट्र बंद का ऐलान किया. 1 जनवरी को पुणे में दलित समुदाय भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह मना रहे थे. लेकिन कार्यक्रम में दो गुटों के बीच हुए टकराव में एक व्यक्ति की मौत हो गई और कुछ घायल हो गए, जिसके बाद मुंबई समेत राज्य के अन्य इलाकों में तनाव फैल गया. दलित और मराठा समुदाय के बीच पैदा हुई इस तनातनी का असर महाराष्ट्र के अन्य इलाकों में भी नजर आ रहा है.

राज्य सरकार ने बंद के मद्देनजर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं. मुंबई से सटे पालघर, ठाणे और विरार स्टेशनों पर रेल सेवा रोकने की कोशिश में दलित कार्यकर्ता नारेबाजी करते और झंडे लहराते हुए रेलवे ट्रैक पर कूद गए. मुंबई में स्कूल-कॉलेज सामान्य रूप से खुले हुए है, लेकिन सावधानी बरतने के लिए स्कूल बस सड़कों से दूर हैं.

ऑटो टैक्सी चल रहीं है लेकिन डब्बावालों ने अपनी सेवाएं बंद कर दी हैं. ठाणे, नागपुर, पुणे और अन्य शहरी क्षेत्रों के मुकाबले बाहरी इलाकों में बंद का ज्यादा असर देखने को मिल रहा है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है और युवक की मौत की न्यायिक जांच के आदेश भी दिए हैं. बाबा साहब भीम राव अंबेडकर के पोते और एक्टिविस्ट प्रकाश अंबेडकर ने बंद का आह्वान किया है.

सियासी हलचल

इस मुद्दे पर सियासी हलचल भी तेज हो गई है. बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने इस पूरी हिंसा के लिए बीजेपी और आरएसएस को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने कहा, "महाराष्ट्र में बीजेपी की सरकार है और इस हिंसा के पीछे बीजेपी, आरएसएस जैसी जातिवादी ताकतों का हाथ है." 

वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी ट्वीट कर बीजेपी पर निशाना साधा है. गांधी ने कहा, "भारत को लेकर आरएसएस और बीजेपी का फासीवादी दृष्टिकोण यही है कि दलितों को भारतीय समाज में निम्न स्तर पर ही बने रहना चाहिए."

वहीं आरएसएस की ओर से जारी बयान में लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की गई है.

क्या है कोरेगांव की लड़ाई

इस लड़ाई का इतिहास 200 साल पुराना है. हर साल 1 जनवरी को महाराष्ट्र में दलित समुदाय की महार जाति कोरेगांव के पास बने विजय स्मारक पर एकत्रित होती है और 200 साल पहले मिली जीत का जश्न मनाती है. यह स्मारक महार जाति के लिए खासा मायने रखता है. माना जाता है कि साल 1818 में ब्रिटिश हुकूमत और मराठाओं के बीच युद्ध हुआ.

उस वक्त मराठाओं की कमान पेशवा बाजीराव द्वितीय के हाथ में थी. ऐतिहासिक दस्तावेज में दोनों ही पक्षों की सीधी-सीधी जीत के साक्ष्य नहीं मिलते. लेकिन इसे आखिरी अंग्रेज-मराठा युद्ध भी कहा जाता है. साथ ही स्मारक पर ब्रिटिश हुकूमत का जीत संदेश भी लिखा है.

इतिहासकारों के मुताबिक ब्रिटिश सेना में उस वक्त बड़ी संख्या में महार समुदाय के लोग शामिल थे जिन्हें उच्च जाति अछूत कहती थी. हालांकि शिवाजी की सेना में भी बड़ी संख्या में दलित थे लेकिन जब पेशवाओं ने शासन संभाला तो महार जाति के साथ उच्च जाति वालों ने काफी बुरा बर्ताव किया.

ऐसे में जब कोरेगांव की लड़ाई हुई तो महार समुदाय ने ब्रिटिश सेना की ओर से शस्त्र उठाये. दलित समुदाय के लिए यह जीत उच्च जाति पर जीत थी. वहीं मराठा इसे ब्रिटिश हुकूमत की जीत मानते आए हैं, जिसे वह राष्ट्रहित के खिलाफ समझते हैं.

आईएएनएस/अपूर्वा अग्रवाल

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