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दुनिया

महामारी का रूप ले चुके हैं बलात्कार

संयुक्त राष्ट्र ने महिलाओं पर होने वाली हिंसा खत्म करने के लिए 25 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय दिन बनाया है. डॉयचे वेले के ग्रैहम लुकस के मुताबिक महासचिव बान की मून का इस वैश्विक अभियान को समर्थन देना एक अहम संकेत है.

महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा से जुड़े समाचार सोशल मीडिया में महीनों से छाए हुए हैं. इन प्लेटफॉर्म्स के कारण ही संभव हो पा रहा है कि हम इस हिंसा के पैटर्न पर निगरानी रख सकते हैं. दुखद है कि हर दिन चौंकाने वाले व्यवहार की खबरें सामने आ रही हैं और खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही.

जिस तरह महिलाओं पर हिंसा के मामले सामने आ रहे हैं वह अविश्वसनीय है. भारत में बलात्कार के मामले महामारी का रूप ले चुके हैं. बलात्कार के बाद हत्या की अनगिनत रिपोर्टें सामने आ रही हैं. भले ही कानून कड़ा कर दिया गया हो लेकिन महिलाओं के प्रति पुरुषों के रवैये में कोई फर्क नहीं पड़ रहा. हाल ही में एक गांव में एक महिला को निर्वस्त्र कर गधे पर बिठा कर गांव में घुमाया गया.

हालांकि यह सिर्फ भारत की ही समस्या नहीं है, दुनिया में कई देश ऐसे हैं जहां महिलाएं रोज हिंसा का शिकार होती हैं. जैसे नाइजीरिया में करीब दो सौ लड़कियों का अपहरण कर लिया गया और उन्हें बोको हराम के लड़ाकों से शादी करने पर मजबूर किया गया. वहीं सीरिया और इराक से मिली विश्वसनीय रिपोर्टों से पता चला है कि ईसाई महिलाओं को बेच कर उन्हें देह व्यापार में धकेल दिया जाता है या फिर उनका धर्म परिवर्तन कर लड़ाकों से उनकी शादी कर दी जाती है.

करीब तीन करोड़ लड़कियों का खतना कर दिया जाता है. इतना ही नहीं, करीब 13 करोड़ लड़कियां ऐसी भी हैं जिनका खतना बहुत ही क्रूर तरीके से कबायली प्रमुख या मां करती रही हैं. छोटी लड़कियों का बहुत बड़ी उम्र के आदमियों से विवाह भी एक समस्या है. इसका नतीजा यह होता है कि वह पढ़ लिख नहीं पाती और जल्दी गर्भधारण के कारण उनकी मृत्यु या प्रसव के दौरान बच्चा और जच्चा दोनों की जान जाने की आशंका बढ़ जाती है. इतना ही नहीं वह घरेलू हिंसा का भी ज्यादा शिकार हो सकती हैं. जब लड़के बचपन से मां के साथ होने वाले दुर्व्यवहार को देखते हैं तो वह खुद भी महिलाओं के साथ उसी तरह से पेश आते हैं.

यह उत्तर, दक्षिण, पूर्व या पश्चिम का मुद्दा नहीं है. महिलाओं के साथ बुरा व्यवहार और उनपर हिंसा वैश्विक है. बस पारंपरिक, पितृसत्तात्मक समाजों में उन्हें उनके अधिकार नहीं दिए जाते. इसका एक उदाहरण हाल ही में मिला जब तुर्की के राष्ट्रपति रेजेब तईब एर्दोआन ने दिखाया कि अभी हमें बहुत आगे बढ़ने की जरूरत है. एर्दोआन का मानना है कि महिलाओं के लिए समानता का अधिकार अप्राकृतिक है. शायद एक महिला का जीवन रसोईघर तक ही सीमित होना चाहिए. उनके जैसा सोचने वाले लोग बहुत ज्यादा हैं. सऊदी अरब में नेता महिलाओं को कार चलाने देने के पक्ष में नहीं हैं. मूलभूत अधिकारों का नहीं मिलना दुर्व्यवहार को आमंत्रण है.

इस पृष्ठभूमि में यह हैरानी की बात नहीं है कि ये आंकड़े घातक हैं. अपने जीवन में करीब 35 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी तरह की शारीरिक या मानसिक हिंसा का शिकार होती हैं. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक कई देशों में यह आंकड़ा 70 प्रतिशत है.

महिलाओं पर होने वाली हिंसा के विरोध में अभियान चलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने आम लोगों को इसमें शामिल होने की अपील की है और इस तरह के कार्यक्रम करने की भी अपील की है जिससे लोगों में जागरूकता बढ़े. मीडिया को भी इस अभियान में मदद देनी चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि इस तरह के अभियान को जितना हो सके स्थान मिले. शोध कहते हैं कि जिस समाज में महिलाओं और पुरुषों के साथ एक जैसा बर्ताव किया जाता है वे सुखी होते हैं. समान अधिकार देने में कोई किंतु परंतु नहीं है. महिलाओं को समान अधिकार, मौके दिये ही जाने चाहिए और दुर्व्यवहार से उन्हें बचाना चाहिए.

अगर सरकारें इस तरह के अभियान को लंबे समय तक मदद देती हैं तो समाज में निश्चित ही बदलाव होगा. इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति और नेताओं के सहयोग की जरूरत है और आदमियों के भी. खुद को महिलावादी कहने में वह गर्व महसूस करें और उसी तरह से बर्ताव करें.

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