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महाकीटाणु को दिल्ली का नाम देने पर मांगी माफी

ब्रिटेन से प्रकाशित होने वाले मेडिकल जरनल लांसेट के संपादक ने महाकीटाणु को नई दिल्ली का नाम देने पर माफी मांगी और कहा कि वायरस को यह नाम देने से भारत अनुचित रूप से बदनाम हुआ. 2010 में एनडीएम वन सामने आया.

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ई कोलाई बैक्टेरिया में पहली बार मिला एनडीएम-वन

मेडिकल जरनल लांसेट के संपादक रिचर्ड हॉर्टन ने नई दिल्ली में मंगलवार को कहा, "यह गलत फैसला था. हमने इसके परिणामों के बारे में नहीं सोचा. और इसके लिए मैं माफी चाहता हूं. यह नाम देश और शहर को अनुचित रूप से बदनाम करता है." हॉर्टन ने कहा कि शोधकर्ताओं को इसे बदलना चाहिए.

2010 अगस्त में लांसेट पत्रिका में छपे लेख में सुपरबग को न्यू डेल्ही मेटालो बीटा लेक्टामेज का नाम दिया गया था. लांसेट का दावा है कि महाकीटाणु दुनिया भर में सार्स(सिवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम) और स्वाइन फ्लू जैसी घातक बीमारियों का कारण बन सकता है.

शोधकर्ताओं ने इस एन्जाइम का नई दिल्ली के नाम पर नामकरण कर दिया क्योंकि यह वायरस उन लोगों में मिला जो चिकित्सा या कॉस्मेटिक सर्जरी के लिए भारत आए थे. भारत ने इस नाम पर कड़ी प्रतिक्रिया दी. भारत के डॉक्टरों ने इस नाम का विरोध करते हुए कहा कि इस नाम से लगता है कि यह महाकीटाणु दिल्ली में पैदा हुआ. तो कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि यह भारत के फलते फूलते मेडिकल टूरिज्म यानी चिकित्सा के लिए भारत आने वाले लोगों को रोकने का एक षडयंत्र है.

भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने लांसेट की रिपोर्ट को अतिरंजित और अनुचित बताया और एनडीएम1 नाम की शिकायत दर्ज की.

2009 में एनडीएम-वन जीन को पहली बार कार्डिफ यूनिवर्सिटी के टिमोथी वॉल्श ने दो तरह के बैक्टेरिया में पहचाना था. उन्हें स्वीडन के एक मरीज में क्लेबसिएला न्यूमोनी और एस्चेरिशिया कोलाई बैक्टेरिया में मिला. यह मरीज भारत में एक अस्पताल में भर्ती था.

महाकीटाणु को एनडीएम नाम देने के बाद यह मामले कनाडा, अमेरिका, बेल्जियम, नीदरलैंड्स, ऑस्ट्रिया, फ्रांस, जर्मनी, केन्या, ऑस्ट्रेलिया, हॉंगकॉंग और जापान में पाए गए.

हॉर्टन ने कहा कि वह शोध का पूरी तरह से समर्थन करते हैं. भारत में एंटिबायोटिक दवाइयों का इस्तेमाल करने की नीति ढीली है. इस कारण डॉक्टर एंटिबायोटिक दवाइयां बहुत ज्यादा मामलों में लिख देते हैं. इस कारण बैक्टेरिया या वायरस बहुत जल्दी प्रतिरोधी हो जाते हैं.

रिपोर्टः एएएफपी/आभा एम

संपादनः महेश झा

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