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मनोरंजन

महफिल में बना है मोहब्बत करने वाला

"मोहब्बत करने वाले कम न होंगे, तेरी महफिल में लेकिन हम न होंगे", मेहदी हसन की यह गजल आज भी सबकी जबान पर है. गजल की ही तरह मेहदी हसन भी आज सभी के दिलों में जिंदा हैं.

पाकिस्तानी गजल गायक मेहदी हसन के गले से निकले शब्द हर प्यार करने वाले की आवाज बन जाते. उनकी गजलों ने जैसे लोगों के अंदर के खालीपन को भर दिया. 13 जून 2012 को मेहदी हसन अपने चाहने वालों को बिलखता छोड़ इस दुनिया से रुखसत हो गए. पाकिस्तान के कराची में उनका निधन हुआ. दुनिया से जाने से पहले वे एक आखिरी बार अपने वतन का दीदार करना चाहते थे. पर यह खाविश उनके साथ ही दफ्न हो गयी. मेहदी हसन का जन्म 18 जुलाई 1927 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के लूणा गांव में हुआ था. आज जिस तरह उन्हें पाकिस्तान में याद किया जाता है, उसी प्रकार लूणा में भी. वे विभाजन के वक्त पाकिस्तान गए थे.

मेहदी हसन का भारत से विशेष लगाव रहा. उन्हें जब भी भारत आने का मौका मिलता, वे दौड़े चले आते. शेखावटी की धरती उन्हें अपनी ओर खींचती रही. इसी कारण पाकिस्तान में आज भी मेहदी हसन के परिवार में सब लोग शेखावटी की मारवाड़ी भाषा में बात करते हैं.

जब घर लौटे हसन

भारत से पाकिस्तान जाने के बाद मेहदी हसन पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना चुके थे. 1978 में जब वे अपनी भारत यात्रा पर आए, तो गजलों के एक कार्यक्रम के लिए वे सरकारी मेहमान बन कर जयपुर पहुंचे. उनकी इच्छा पर प्रशासन द्वारा उन्हें उनके पैतृक गांव लूणा ले जाया गया. कारों का काफिला जब गांव की ओर बढ रहा था, तो रास्ते में उन्होंने अपनी गाड़ी रुकवा दी. गांव में सड़क के किनारे एक टीले पर छोटा सा मंदिर बना था, जहां वे रेत में लोटपोट होने लगे. उस समय जन्म भूमि से ऐसे मिलन का नजारा देखने वाले भी भाव विभोर हो उठे. ऐसा लग रहा था जैसे वे मां की गोद में लिपट कर रो रहे हों. उन्होंने बताया कि वे बचपन में वहां बैठकर भजन गाया करते थे.

मेहदी हसन ने हमेशा भारत और पाकिस्तान के बीच एक सांस्कृतिक दूत की भूमिका निभाई. 1993 में एक बार फिर वे परिवार सहित लूणा पहुंचे. इसी दौरान उन्होंने गांव के स्कूल में बनी अपने दादा इमाम खान और मां अकमजान की मजार की मरम्मत करवाई और पूरे गांव में लड्डू बंटवाए. आज यह मजार बदहाली की स्थिति में वीरान और सन्नाटे से भरी है.

परिवार की प्रथा

मेहदी हसन को गायन विरासत में मिला था. उनके दादा इमाम खान बड़े कलाकार थे, जो उस वक्त मंडवा और लखनऊ के राज दरबार में गाते थे. मेहदी हसन के पिता अजीम खान भी अच्छे कलाकार थे. इस कारण उस वक्त भी उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी थी. पाकिस्तान जाने के बाद भी मेहदी हसन ने परिवार की प्रथा को जारी रखा. लेकिन वे अपने परिवार के पहले गायक थे जिसने गजल गाना शुरु किया.

1952 में कराची रेडियो स्टेशन से जुड़कर उन्होंने अपने गायन का सिलसिला जारी रखा. 1958 में शायर अहमद फराज की गजल "रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ" से मेहदी हसन को पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली. उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

गायकी का नया मुकाम

उनके बारे में लता मंगेशकर ने एक बार कहा था कि मेहदी हसन के गले में तो स्वयं भगवान ही बसते है. "पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है" जैसी मध्यम सुरों में गजल गाने वाले मेहदी हसन ने "केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देश" जैसी राजस्थान की मांड को भी उतनी ही शिद्दत के साथ गाया. राजस्थानी भाषा पर भी उनकी उर्दू जैसी ही पकड़ थी.

मेहदी हसन के बारे में मशहूर कव्वाल दिलावर बाबू का कहना है, "यह हमारे लिए बड़े फख्र की बात है कि उन्होंने झुंझुनू का नाम पूरी दुनिया में अमर किया. उन्होंने गजल को पुनर्जन्म दिया. दुनिया में ऐसे हजारों लोग हैं जो उनकी वजह सें गजल गायक बने. उन्होंने गजल गायकी को एक नया मुकाम दिया."

"न किसी की आंख का नूर हूं, न किसी के दिल का करार हूं, जो किसी के काम न आ सके, मैं वो एक मुश्ते गुबार हूं", के साथ मेहदी हसन एक बड़ी बात कह गए. "तन्हा तन्हा मत सोचाकर, मर जावेगा, मर जावेगा, मत सोचाकर" बहुत मशहूर हुई. उन्होंने ना सोचने की बात तो कही, पर अपनी गजलों के साथ वे अपने चाहने वालों को जिंदगी भर सोचने का सामान दे गए.

आईबी/एमजे (वार्ता)

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