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दुनिया

महंगे रमजान से परेशान अफगान

इबादत और रोजों का महीना रमजान बरकत का महीना भी माना जाता है. लेकिन इस महीने में अफगानिस्तान में लोगों की परेशानी चौगुनी हो जाती है, जिसमें हर चीज महंगी हो जाती हैं.

सुबह से शाम तक रोजा रखने के बाद इफ्तार और रात के खाने में पौष्टिक चीजों की जरूरत होती है लेकिन महंगाई की वजह से आम अफगान को यह मुहैया नहीं. काबुल के शहरे नव मुहल्ले में फल बेचने वाले जान आगा भी बताते हैं कि बहुत से लोग उनसे फल तक नहीं खरीद पाते, "मैं इसे महंगा खरीदता हूं और महंगा बेचना पड़ता है. मुझे बुरा लगता है जब लोग नहीं खरीद पाते. पहले हम 15 अफगानी में एक आम बेचते थे, लेकिन अब हम खुद 25 अफगानी में खरीदते हैं. और इसे कम से कम 30 अफगानी में बेचना पड़ता है."

Bildergalerie - Ramadan in Bangladesh

रमजान में पौष्टिक खाने की दरकार

अफगानिस्तान की ज्यादातर दुकानों में आयात की गई खाने की चीजें होती हैं. ये सामान पाकिस्तान और ईरान से आता हैं. काबुल के तैमानी मुहल्ले में दुकान चलाने वाले मुहम्मद जमीर कहते हैं कि थोक विक्रेता कालाबाजारी करते हैं, "हम दुकानदार दाम नहीं बढ़ाते. हम इस पाक महीने में अपने भाइयों और बहनों के साथ धोखा नहीं करते. लेकिन थोक विक्रेता रमजान से पहले सामान आयात कर लेते हैं और वे कीमतों के साथ बहुत छेड़छाड़ करते हैं."

सरकार पर आरोप

काबुल के थोक विक्रेताओं ने इस सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया. दुकानदार और रेहड़ी वाले कहते हैं कि इस पूरे मामले पर सरकार आंखें बंद किए बैठी रहती है. इलेक्ट्रिक के सामानों की मरम्मत करने वाले हाजी तैमूर शाह कहते हैं, "दूसरे इस्लामी देशों में सरकारें और कारोबारी रमजान के महीने में चीजों में डिस्काउंट देने की कोशिश करते हैं ताकि उन्हें पाक महीने में सवाब मिल सके." वह मायूस होकर कहते हैं, "लेकिन अफगानिस्तान में इसका उलटा है. सरकार को मतलब नहीं और कारोबारी सिर्फ अपना फायदा देखना चाहते हैं. वे दुनयावी फायदे के चक्कर में दीनी सवाब खो रहे हैं."

काबुल नगर निगम अब चीजों के दाम तय नहीं करता. निगम के अधिकारी अब्दुल कादिर आरजू बताते हैं, "पहले हमारे यहां एक विभाग होता था, जो दाम और गुणवत्ता पर नजर रखता था. लेकिन 2003 में इसे खत्म कर दिया गया क्योंकि सरकार ने मुक्त बाजार की वकालत की."

शरबत खान अपने सात लोगों के परिवार के बारे में सोच सोच कर हलकान हो जाते हैं. 50 साल की उम्र और रोजगार के नाम पर मजदूरी, "रमजान तो बरकतों का महीना है. लेकिन मेरे जैसे गरीब लोगों के लिए यह मुश्किल का महीना है. हमें इस महीने में बेहतर खाना खाना चाहिए लेकिन महंगाई से यह नहीं हो पाता है."

पीने को सिर्फ पानी

गर्मी के महीने में रमजान का मतलब इफ्तार के वक्त पीने को बढ़िया शर्बत या जूस. लेकिन कई लोगों को पानी के अलावा कुछ मयस्सर नहीं. काबुल में रेहड़ी लगाने वाले जमानुद्दीन कहते हैं, "अगर आप अमीर हैं तो कोई परेशानी नहीं क्योंकि आप अच्छा खाना खा सकते हैं, फल खा सकते हैं. लेकिन अगर आप गरीब हैं, तो आपको पौष्टिक खाना नहीं मिल सकता. इससे रोजा और मुश्किल हो जाता है."

रमजान में तरबूज, आम और केले खाने चाहिए पर चूंकि वे पाकिस्तान से आ रहे हैं, लिहाजा बहुत महंगे हो गए हैं. डॉक्टर उस्मान गौसी कहते हैं कि उनके मरीज कमजोरी की शिकायत कर रहे हैं, "हम हर रोज 50 मरीज देख रहे हैं. इनमें से 30 को पेट दर्द या खून की कमी है."

दूसरी तरफ अफगानिस्तान का वाणिज्य मंत्रालय महंगाई से इनकार करता है. प्रवक्ता मुसाफिर कोकांदी कहते हैं, "कुछ भी बहुत महंगा नहीं हुआ है. सिर्फ दो तीन चीजों के दाम बढ़े हैं." उनका कहना है कि जो महंगी चीजें बेच रहे हैं, वे देश के गद्दार हैं.

लेकिन बाजार में माहौल अलग है. मीट की दुकान से गुजरते छात्र बख्तार ने बताया, "देखिए, यहां कितना मीट है लेकिन हर कोई तो नहीं खरीद सकता." उसकी बात पर कसाई अब्दुल शकूर मुहर लगाता है, "सही बात है. पहले हम 6000 अफगानी में भेड़ खरीदते थे, अब 8000 से 9000 अफगानी देने पड़ते हैं."

एजेए/आईबी (डीपीए)

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