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दुनिया

महंगे अस्पतालों का इलाज भी जरूरी है

भारत के कई प्राइवेट अस्पतालों में लूट कोई नयी बात नहीं है. फोर्टिस अस्पताल पर भी ऐसे ही आरोप लग रहे हैं. उसका 16 लाख रुपये का बिल कई शकाएं पैदा कर रहा है.

गुड़गांव के फोर्टिस अस्पताल ने सात साल की बच्ची का डेंगू का इलाज किया. बच्ची नहीं बच सकी और अस्पताल ने 15 दिन के इलाज के लिए 16 लाख रुपये का बिल थमा दिया. सात साल की बच्ची को 31 अगस्त को गुड़गांव के फोर्टिस अस्पताल में आईसीयू में भर्ती कराया गया था. डेंगू की वजह से बच्ची की हालत गंभीर थी. 14 सितंबर को बच्ची ने दम तोड़ दिया.

अभिभावकों का आरोप है कि अस्पताल ने जानबूझकर आखिर के तीन दिन तक बच्ची को वेंटिलेटर पर रखा. इकोनॉमिक टाइम्स अखबार से बातचीत में बच्ची के पिता ने कहा, 14 सितंबर को एमआरआई के बाद एक डॉक्टर ने कहा कि बच्ची के मस्तिष्क का 70 से 80 फीसदी हिस्सा खराब हो चुका है और अब इलाज का कोई फायदा नहीं है. वहीं दूसरे डॉक्टर ने फुल बॉडी प्लाज्मा ट्रांसप्लांट का मशविरा दिया.

डॉक्टरों की अलग अलग राय के बाद मां बाप ने बच्ची को दूसरे अस्पताल ले जाने की कोशिश की और इसी दौरान उसने दम तोड़ दिया. अभिभावकों के मुताबिक बच्ची की मौत के बाद फोर्टिस अस्पताल ने उन्हें 16 लाख रुपये के बिल थमाया. बिल में 2,700 दस्तानों का जिक्र था. यदि अभिभावकों का दावा सही है तो इसका मतलब है कि अस्पताल ने हर दिन करीब 200 ग्लव्स इस्तेमाल किये. यह विचित्र है.

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परिवार के एक मित्र के ट्वीट से यह जानकारी बाहर आई. D@DopeFloat हैंडल से किये गये ट्वीट में कहा गया कि, "मेरे एक बैचमेट की सात साल की बच्ची डेंगू की वजह से 15 दिन फोर्टिस हॉस्पिटल में रही. बिल 18 लाख का आया, जिसमें 2,700 दस्ताने भी शामिल थे. अंत में उसकी मौत हो गई." इस ट्वीट को 9,000 से ज्यादा लोगों ने रिट्वीट किया. और इस तरह मामले की जानकारी सार्वजनिक हुई. अब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने मामले में दखल दिया है. नड्डा ने ट्वीट में कहा, "कृपया मुझे डिटेल्स दीजिए...हम सभी जरूरी कदम उठाएंगे."

टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार ने बच्ची के पिता से बातचीत की. पिता जयंत सिंह ने अखबार से कहा, "सरकार को इन पर कार्रवाई करनी चाहिए ताकि कोई भी अस्पताल अपने मरीजों के साथ ऐसे पेश न आए."

वहीं अस्पताल ने सफाई देते हुए बयान जारी किया है, "मरीज के इलाज के दौरान सभी स्टैंडर्ड मेडिकल प्रोटोकॉल्स और क्लीनिकल गाइडलाइंस का पालन किया गया." हॉस्पिटल के मुताबिक बच्ची की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी. उसे 48 घंटे के भीतर वेंटिलेंटरी सपोर्ट सिस्टम पर रखना पड़ा. अस्पताल का दावा है कि "14 सितंबर को परिवार ने हॉस्पिटल की सलाह के उलट मरीज को ले जाने की कोशिश की और उसी दिन बच्ची की मौत हो गई."

(मरीज को डॉक्टर के ढाई मिनट भी नहीं नसीब)

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