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ब्लॉग

महंगा न पड़ जाए पीआईएल

भारत में 1970 में दिए गए जनहित याचिका दायर करने के अधिकार का दुरुपयोग रोकने के लिए अब अदालत ने ही रास्ता निकाला है. पीआईएल को हथियार बनाकर विकास रोकने वालों को इसकी कीमत जेब से चुकानी पड़ सकती है.

साधक या बाधक

भारत में कानूनी अधिकारों से लेकर हर तरह के संसाधनों का दुरुपयोग करना सामान्य बनता जा रहा है. जनहित याचिका यानि पीआईएल भी पिछले दो दशक में इस प्रवृत्ति का शिकार हुआ. देश भर में सरकार अथवा निजी क्षेत्र की किसी भी परियोजना को रुकवाने के लिए असंतुष्ट गुटों द्वारा पीआईएल का जम कर इस्तेमाल होता है.

सुप्रीम कोर्ट से लेकर हर हाई कोर्ट में पीआईएल के महारथियों की भारी भरकम फौज खड़ी हो गई है. इनमें मजदूर यूनियनों से लेकर रक्षा सौदों और अन्य परियोजनाओं के ठेकेदारों तक का संगठित गिरोह सक्रिय रहता है जो पीआईएल और इनके महारथी वकीलों के माध्यम से अपना उल्लू सीधा करता है. हालांकि वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, अशोक अग्रवाल और एमसी मेहता जैसे नामी वकीलों ने पीआईएल का सदुपयोग कर भ्रष्टाचार और पर्यावरण जैसे मुद्दों को भी उठाया है. वहीं दूसरी ओर कांडला पोर्ट परियोजना से लेकर जीएमआर विकास जैसी कई परियोजनाएं पीआईएल की वजह से सालों अटकी रहीं.

क्या है मौजूदा मामला

बाम्बे हाई कोर्ट ने भूमिगत सीवरलाइन की एक परियोजना को पर्यावरण हितों के खिलाफ बताते हुए रोकने की मांग करने वाली पीआईएल को सुनवाई के लिए स्वीकार करने से पहले एक शर्त लगा दी. अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा कि उसकी याचिका पर तभी सुनवाई होगी जबकि वह हलफनामा देकर अदालत को भरोसा दे कि अगर उसकी याचिका गलत साबित होती है तो परियोजना के लंबित होने पर उसकी लागत में होने वाले इजाफे की वह अपनी जेब से भरपाई करेगा.

याचिकाकर्ता अतुल धुले महराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले के वेंगुर्ला में भूमिगत सीवरलाइन प्रोजेक्ट को पर्यावरण के लिए खतरा बताते हुए रुकवाने की मांग कर रहे हैं. अदालत की इस शर्त पर फिलहाल उन्होंने हलफनामा पेश नहीं किया है लेकिन देश भर में पीआईएल के महारथियों के बीच अदालत के इस आदेश का सख्त संदेश जरूर गया है.

क्या होगा असर

दिल्ली हाई कोर्ट में पीआईएल के माध्यम से जनहित के तमाम मुद्दे उठा रहे वरिष्ठ वकील सुग्रीव दुबे बाम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले को स्वागत योग्य बताते हैं. उनका कहना है कि देश भर में वकीलों का एक तबका है जो पीआईएल का दुरुपयोग कर इसके मकसद को नाकाम कर रहा है. वह कहते हैं कि सरकारी अथवा गैरसरकारी योजना के बनने के साथ ही पीआईएल के संगठित गिरोह इनमें अड़ंगा डालने के लिए सक्रिय हो जाते हैं.

पीआईएल का फैसला आने तक वह योजना लंबित रहती है. इससे उसकी कीमत अथवा लागत बढ़ जाती है और सरकारी खजाने को अनावश्यक नुकसान होता है. इतना ही नहीं सरकार में शामिल कई नेता भी इन गिरोहों के पोषक होते हैं ओर परियोजनाओं की लागत बढ़वाने के लिए नेता भी पीआईएल को हथियार की तरह इस्तेमाल करवाते हैं. हालांकि दुबे स्वीकार करते हैं कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इस तरह की दुष्प्रवृत्ति से वाकिफ हैं और अब अदालतें पीआईएल को पूरी तरह से जांचने परखने के बाद ही सुनवाई के लिए स्वीकार करती हैं.

समाज में बढ़ते भ्रष्टाचार को देखते हुए अधिकारों के दुरुपयोग का सिलसिला निसंदेह यूं ही जारी रहेगा. इस जमीनी हकीकत को स्वीकार करते हुए व्यवस्था का संचालन करने वालों को ही बाम्बे हाई कोर्ट की ही तर्ज पर इस तरह के नियामक उपाय खोजने होंगे जिससे पीआईएल जैसे पवित्र हथियार का दुरुपयोग रोका जा सके.

ब्लॉगः निर्मल यादव

संपादनः अनवर जे अशरफ

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