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दुनिया

मस्ती में सराबोर कोलोन...

जर्मनी के पांचवे सबसे बड़े शहर कोलोन की कार्निवाल परेड, ब्राजील के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी परेड मानी जाती है. सोमवार को हुई परंपरागत परेड में करीब 170 फेस्टिवल कमिटियों ने हिस्सा लिया.

कोएल्ले अलाफ, कोलोन अलाफ... ट्रेन, बस, रेस्तरां और कोलोन शहर के हर कोने से सोमवार को बस एक ही आवाज आ रही थी. लोग खुशी से झूम रहे थे, मदमस्त संगीत पर नाच-गा रहे थे क्योंकि मौका था कार्निवाल के अंतिम दिन सोमवार को होने वाली रोजमंडे परेड का. बीते साल 11 नवंबर से शुरू हुआ कार्निवाल 27 फरवरी को समाप्त हो रहा था और इसलिए लोग परेड देखने के लिए सिटी सेंटर के हर कोने में इकट्ठा थे.

पिछले दो महीनों के दौरान यह पहला मौका था जब मैंने यूरोप के किसी शहर में लोगों का ऐसा हुजूम देखा. कार्निवाल की कुछ जानकारी तो बॉन में रहते हुए मिल गई थी लेकिन इसके बावजूद कोलोन की झूमती हवाओं को महसूस करना अपने आप में एक अलग अनुभव रहा. यहां आकर पता चला कि राइनलैंड के किनारे बसे शहरों में चार नहीं पांच मौसम होते हैं. पांचवा मौसम कार्निवाल का मौसम और लोगों पर जाड़े के बावजूद इस पांचवें मौसम का खुमार इतना हावी होता है कि आप इनसे बहस तो कर ही नहीं सकते. बातचीत में जब मैंने एक व्यक्ति से कहा कि ब्राजील के बाद कोलोन की परेड दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी परेड है तो वह मुझ पर बरस पड़ा. उसने ये मानने से इनकार तो किया ही साथ ही भविष्य में ऐसा न कहने की हिदायत भी दे डाली. शायद ये उसका कोलोन प्रेम था, जो जश्न की खुशी में छलक पड़ रहा था.

कार्निवाल का सीजन पूरा होने के बाद यहां के लोगों के लिए उपवास का महीना शुरू होता है. कोलोन टूरिज्म से मिली जानकारी के मुताबिक इस शहर के इतिहास की ही तरह इस कार्निवाल का इतिहास भी काफी पुराना है. लेकिन इसे मनाने का मौजूदा तरीका महज 200 साल पुराना है. माना जाता है कि यूनानी और रोमन लोग वसंत का स्वागत करते हुए वाइन के देवता डायनासयॉस के सम्मान में यह महोत्सव मनाया करते थे. प्राचीन जर्मन लोग भी देवताओं के सम्मान में और सर्दियों के बुरे राक्षसों को भगाने के लिए इसे मनाते थे जिसे बाद में ईसाइयों ने अपना लिया और आधिकारिक तौर पर चर्च ने इसे अपने कैलेंडर में शामिल कर लिया. इसके बाद कोलोन पर फ्रांसीसी या प्रशिया जिस का भी आधिपत्य रहा सभी ने इस कार्निवाल को मनाने की अनुमति दी. परेड में लोग शासकों और सेना का मजाक उड़ाते नजर आते थे और यह परंपरा आज भी जारी है. परेड में नीले और सफेद पोशाक में आए लोग दो सौ साल पहले की फ्रांसीसी सेना का प्रदर्शन करते हैं जो अपने समय में बेहद क्रूर मानी जाती थी. सोमवार की परेड में दिखाई गई झांकियों में भी अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप. जर्मनी की चांसलर मैर्केल, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोवान की जमकर खिंचाई हुई.

कोलोन में रहनी वाली रोसा एक टी बैग की पोशाक में यहां आई थीं. उन्होंने बताया कि उनका जन्म कोलोन में नहीं हुआ है लेकिन उनकी शादी एक जर्मन से हुई है. रोसा ने बताया कि पहली बार यह परेड देखने वाले लोगों को कमेले कमेले कह कर टॉफियां और मिठाई जुटाते पागल लग सकते हैं लेकिन असल में यह इनकी खुशी जाहिर करने का तरीका है. रंग-बिरंगे परिधानों, वेशभूषा में लिपटे लोगों की यह भीड़ परेड में ट्रकों से बरसाई जाने वाली मिठाई, चॉकलेट और तमाम चीजों को बटोरती नजर आती है. मैंने भी कुछ सामान लेने की कोशिश की लेकिन जल्द ही समझ आ गया कि इन लोगों के सालों के अनुभव के सामने मेरा उत्साह ज्यादा देर नहीं टिकेगा.

कोलोन के लोगों के अलावा हमें इस कार्निवाल में दो भारतीय भी मिले जो नेपोलियन और पोस्टमास्टर की वेशभूषा में यहां पहुंचे थे. उन्होंने बताया कि इस महोत्सव को देखकर उन्हें महाराष्ट्र की दही-हांडी, भारत की होली और बंगाल की दुर्गा-पूजा की याद आ गई.

इटली से आईं एवलीन यहां एक सफाई कर्मचारी की वेशभूषा में थीं. उन्होंने कहा कि पिछले दस सालों में परेड के दिन का मौसम इतना बेहतरीन कभी नहीं रहा, यहां तक कि पिछले साल तो खराब मौसम के चलते पड़ोसी शहर डुसलड्रोफ में परेड ही रद्द कर दी गई थी.

परेड में करीब 70 ट्रक और इन पर सवार लोगों के अलावा, घोड़े, बग्गी, और तमाम गाड़ियां भी शामिल थीं जिस पर खड़े मसखरे बने लोग दर्शकों पर चॉकलेट, मिठाई आदि के साथ-साथ फूल भी बरसा रहे थे. लोगों की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सड़कों की बैरिकेडिंग की गई थी और सड़क को परेड के गुजरने के लिए खाली छोड़ा गया था. लोगों के उत्साह को बनाए रखने के लिए म्यूजिक बैंड्स की भी भरपूर व्यवस्था थी और सड़क किनारे लगे पंडालों में भी खाने-पीने के बढ़िया इंतजाम थे. शाम आते-आते परेड जब समापन की ओर बढ़ने लगी तब भी लोगों का उत्साह कम होने का नाम नहीं ले रहा था और लोग किसी और जगह जाकर खाने-पीने की योजना बनाने लगे. 

Deutschland Karneval Rosenmontag Köln (AP)

यहां मिले एक व्यक्ति ने बताया कि इस परेड की तैयारी साल भर चलती है और इसमें भाग लेना आसान नहीं हैं. इसमें भाग लेने वाले स्कूली बच्चे मुख्य परेड में शिरकत करने से पहले 60 जगह ऐसे परफॉर्मेंस देते हैं और इसके बाद उन्हें मुख्य परेड के लिए चुना जाता हैं.

वापसी के दौरान मुझे भारतीय सलवार-कमीज और दुपट्टा डाले एक जर्मन लड़की भी दिखी जिसने परेड में भारतीय कपड़े पहने थे और माथे पर मांगटीका, कानों में बालियां और गले में हार भी डाला हुआ था. बातचीत के दौरान उसने बताया कि वह कभी भारत नहीं गई लेकिन उसके किसी रिश्तेदार ने भारत से उसके लिए ये कपड़े भेजे हैं.

मोटा-मोटी कार्निवाल को देखना और इसे महसूस कर इस मस्ती में डूबना अपने आप में बेहतरीन अनुभव है. 

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