मलेशिया में पहचानी गई गुलाम महिला | दुनिया | DW | 27.11.2013
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दुनिया

मलेशिया में पहचानी गई गुलाम महिला

लंदन में जिन तीन महिलाओं को गुलामों की तरह रखा गया था, उनमें से एक मलेशियाई महिला को कुआलालंपुर की पुलिस ने पहचान लिया है. यह महिला 30 साल पहले गायब हो गई थी. उसके मिलने की खबर से परिवार में खुशी है.

मलेशिया के शीर्ष पुलिस अधिकारी खालिद अबु बकर ने ब्रिटिश पुलिस से मिली जानकारी का हवाला देते हुए इस बात की पुष्टि की है कि वह महिला सिती आयशा अब्दुल वहाब है. मलेशिया के द स्टार अखबार ने अपनी वेबसाइट पर इस बारे में एक संक्षिप्त रिपोर्ट छापी है. अब 69 साल की हो चुकी सिती आयशा 1968 में पढ़ाई के लिए ब्रिटेन गई थीं. उसके बाद वह अपने परिवार से नहीं मिलीं.

सिती आयशा की बड़ी बहन हसना अब्दुल वहाब ने समाचार एजेंसी एएफपी से कहा, "अगर वह वापस घर आई तो मैं उससे लिपट कर रो पड़ूंगी. मैं अल्लाह की शुक्रगुजार हूं कि उसने मरने से पहले मेरी उससे मुलाकात की दुआ सुन ली." हसना अब्दुल वहाब दक्षिणी मलेशिया के जेलेबू में रहती हैं और उनके पास सिती आयशा की पुरानी तस्वीर भी है. हसना अब्दुल वहाब ने कहा, "अल्लाह को शुक्रिया कहने के लिए मैं दावत दूंगी. हमें इस पल का बहुत दिनों से इंतजार था."

London Sklaverei Hasnah Abdul Wahab aus Malaysia

हसना अब्दुल वहाब

पुलिस ने इस सिलसिले में दो लोगों को गिरफ्तार भी किया है, जो ब्रिटिश मीडिया के मुताबिक कट्टर माओवादी हैं. इनमें से पुरुष की पहचान भारत में जन्मे अरविंदन बालाकृष्णन के रूप में हुई है जबकि उसकी पत्नी चंदा तंजानिया की है. ब्रिटिश पुलिस ने बहुत सी बातों को अभी जाहिर नहीं किया है क्योंकि तहकीकात चल रही है.

सिती आयशा के जीजा मुहम्मद नोह मुहम्मद दोम ने कहा कि उनकी पत्नी यानी सिती आयशा की दूसरी बहन कमर माहतुम बुधवार को लंदन के लिए रवाना हो गई हैं ताकि वह अपनी बहन की पहचान कर सकें. मुहम्मद दोम ने कहा, "हम खुश हैं क्योंकि हमें यकीन है कि हमारे परिवार का बिछड़ा सदस्य मिल गया है. लेकिन उदास हैं क्योंकि यह भी सुना है कि वह बीमार है और उसे 30 साल से गुलाम बना कर रखा गया है."

एक ब्रिटिश अखबार को दिए इंटरव्यू में कमर माहतुम ने अपनी बहन को उम्मीदों से भरी एक अच्छी युवती बताया. उनके पास दशकों पुरानी अखबार में छपी एक तस्वीर भी है जिसमें एक छात्रा के रूप में सिती आयशा का मुस्कुराता चेहरा दिख रहा है. मलेशिया के बेहतरीन स्कूलों में से एक में पढ़ने के बाद उन्हें इंग्लैंड में पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति मिली. यहीं वह माओवादी दंपति के झांसे में आ गईं. मलेशिया के एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता के हवाले से स्थानीय मीडिया ने खबर दी है कि 1970 के दशक में ब्रिटेन के बहुत से मलेशियाई छात्र "न्यू मलयन यूथ" नाम के एक वामपंथी गुट से जुड़ गए थे. मलेशियाई अखबार ने खबर दी है कि लंदन में मलेशियाई उच्चायोग ब्रिटेन को राजनयिक सहायता देने के लिए दबाव बना रहा है.

एनआर/एजेए (एएफपी)

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