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दुनिया

मर रहीं हैं भाषाएं

वैश्वीकरण के जमाने में पूरी दुनिया चुनिंदा भाषाओं के जरिए एक दूसरे से जुड़ने की कोशिश में है. ऐसे में दुनिया की आधी भाषाएं मर रही हैं. इस सदी के अंत तक 6,500 भाषाएं गायब हो चुकी होंगी.

लुप्त होते जानवरों पर पूरी दुनिया का ध्यान खींचा जा रहा है, जगह जगह सम्मलेन हो रहे हैं, अरबों खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन लुप्त होती भाषाओं का क्या? शहरीकरण होने से लोग लगातार अपनी मातृभाषा से दूर होते जा रहे हैं. कोलोन यूनिवर्सिटी के भाषा विशेषज्ञ निकोलाउस हिमलमन इसकी वजह बताते हैं कि "भाषा ठोस नहीं है". वह कहते हैं कि भाषा संस्कृति जैसी होती है, वह कोई चीज नहीं है, बल्कि संगीत और नृत्य की ही तरह है, जो समय के साथ गुम हो जाती हैं.

संस्कृति का नुकसान

हिमलमन ने इसी महीने जर्मनी के शहर हनोवर में भाषा पर हुई एक कॉन्फरेंस में हिस्सा लिया. इस अंतरराष्ट्रीय कॉन्फरेंस को नाम दिया गया "लैंग्वेज डॉक्यूमेंटेशन: पास्ट - प्रेजेंट - फ्यूचर". यानी अतीत से ले कर वर्तमान और भविष्य में भाषा के सफर पर ध्यान देना. भाषा के 180 जानकार जब साथ आए तो कोलंबिया के जंगलों से ले कर हिमालय के पहाड़ों में इस्तेमाल होने वाली भाषाओं पर चर्चा हुई. 

अल्पसंख्यकों के लिए भाषा की समस्या सबसे गंभीर है, क्योंकि वे अधिकतर समाज के बड़े हिस्से के साथ संघटित होने की कोशिश करते हैं और ऐसे में अपनी भाषा को खोने लगते हैं. भाषा के संस्कृति से जुड़े होने के कारण नुकसान काफी बड़ा होता है. लोग केवल भाषा ही नहीं, बल्कि अपना पारंपरिक ज्ञान भी खोते चले जा रहे हैं, भले ही वह नाव बनाने का तरीका हो या फिर जड़ी बूटियों से दवाएं बनाना.

भाषाओं का रिकॉर्ड

लुप्त होती भाषाओं में सबसे आगे वे हैं जिनकी कोई लिपि नहीं है. इन्हें बचाने के लिए जर्मनी में इन भाषाओं को ऑडियो और वीडियो के माध्यम से सुरक्षित रखा जा रहा है. दरअसल जर्मनी में दुनिया भर की भाषाओं का रिकॉर्ड तैयार किया गया है, जिसे "डॉक्यूमेंटेशन ऑफ एनडेंजर्ड लैंग्वेजेस" या डोब-एस का नाम दिया गया है. इसे भी इस कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत किया गया.

Infografik The Futureless zone ENG OECD

डोब-एस की शुरुआत साल 2000 में फोल्क्सवागेन फाउंडेशन ने की. यह रिसर्च में निवेश करनी वाली जर्मनी की सबसे बड़ी निजी कंपनी है और अब तक 100 से भी ज्यादा प्रोजेक्ट में निवेश कर चुकी है. डोब-एस जो रिकॉर्ड तैयार करता है, उन्हें फिर "द लैंग्वेज आर्काइव" (टीएलए) में डाला जाता है. टीएलए जर्मनी की माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट द्वारा बनाया सॉफ्टवेर है जिस पर 30 लाख यूरो यानी करीब 20 करोड़ रुपये का खर्च आया है. टीएलए का मकसद है भाषाओं को एक डिजिटल रूप देना ताकि भविष्य में भी उन पर शोध किए जा सकें.

पुरानी और बेकार भाषा

इस काम के लिए रिसर्चर दुनिया भर में घूम कर भाषाओं का अध्ययन करते हैं. माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट के फ्रांक जाइफर्ट 1998 से इस काम में लगे हैं. बोर और रेसिगारो भाषाओं के रिकॉर्ड तैयार करने के लिए जब वह अमेजन जंगलों के उत्तर पश्चिमी हिस्से में पहुंचे तो उन्होंने पाया कि वहां के युवा स्पैनिश में ही बात करते हैं, "रोजमर्रा के जीवन में वे अपनी ही भाषाओं को पुराना और बेकार मानते हैं".

भारत में भी हालात कुछ ऐसे ही हैं. शहरों में इस्तेमाल होने वाली भाषा अक्सर हिन्दी, अंग्रेजी और स्थानीय भाषाओं का एक मिला जुला सा रूप होती है. 'हिंग्लिश' के इस्तेमाल में हिन्दी अपनी जगह खोती लगती है.

आईबी/एएम (डीपीए)

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