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विज्ञान

मरम्मत से बचाओ पैसा और ऊर्जा

क्या हमारी ऊर्जा जरूरतों और ऊर्जा की हमारी मांग के बीच कोई संतुलन है? जर्मनी जैसे विकसित देशों में अब लोग ऊर्जा बचाने के साथ साथ पर्यावरण के लिए कुछ कर रहे हैं. भारत की क्या स्थिति है?

आलेक्सांडर श्पेकमान को वह वक्त याद आता है जब एक ग्राहक एक पुराना रेडियो उनकी डिंग फैक्ट्री में लेकर आई. इस बात को पांच साल हो गए हैं. इस महिला को पता चला कि डिंग फैक्ट्री में उन उपकरणों की मरम्मत की जाती है जो बिलकुल खराब हो चुके होते हैं. आलेक्सांडर कहते हैं, "जब रेडियो दोबारा काम करने लगा तो मैं बहुत खुश हुआ." आखिरकार रिपेयर और रिसाइकिल का उनका सिद्धांत सफल हुआ.

फेंकने से पहले सोचें

कोलोन के रिपेयर कैफे के जरिए शहरी लोगों के रवैये में बदलाव लाने की कोशिश की जा रही है. हर हफ्ते रिपेयर कैफे अपने दरवाजे उन लोगों के लिए खोलता है जो रद्दी सामान लेकर आते हैं. इन्हें ठीक किया जाता है और इन्हें फेंकने की नौबत ही नहीं आती.

आलेक्सांडर की ही तरह ऐसे कई लोग हैं जिनका मानना है कि आधुनिक समाज जरूरत से ज्यादा ऊर्जा फूंक रहा है जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है.

विकास या विनाश

निको पैश जर्मनी के ओल्डेनबुर्ग विश्वविद्यालय में पर्यावरण और उत्पादन के प्रोफेसर हैं. जर्मनी में उन्होंने टिकाऊ विकास पर काफी शोध किया है लेकिन जर्मन समाज के बारे में उनकी सोच बहुत उम्मीद नहीं जगाती, "मुझे लगता है कि हमारे समाज में सुधार की क्षमता नहीं है. विकास और वृद्धि प्रकृति और संसाधनों को दांव पर लगाकर नहीं हासिल किए जा सकते हैं. लोगों को अपना रवैया ही नहीं बल्कि अपनी आदतें भी बदलनी होंगी." पैश कहते हैं कि यह बदलाव अपने आप होने के बजाय लोगों की जरूरतों पर निर्भर करेगा. पैश का मानना है कि विकसित देशों में उपभोक्तावादी संस्कृति को नशे के अंतिम पड़ाव के रूप में देखा जा सकता है. बदलाव तब आएगा जब यह ढांचा ढहने लगेगा.

किसको दोष दें

लेकिन क्या केवल विकसित देशों को दोष देने में बुद्धिमानी है. एक तर्क यह है कि उपभोग के जरिए लोग अपने में कमियों को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं और इन देशों की अर्थव्यवस्था लोगों के इस रवैये का फायदा उठा रही है. विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक विकसित देशों का एक व्यक्ति विकासशील देश के नागरिक से कहीं ज्यादा ऊर्जा खर्चता है. विकसित देशों में कार्बन डायोक्साइड उत्सर्जन भी व्यक्तिगत स्तर पर विकासशील देशों से ज्यादा है. अमेरिका में एक व्यक्ति 19 प्रतिशत कार्बन डायोक्साइड उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है लेकिन भारत में हर एक व्यक्ति केवल 1.16 प्रतिशत कार्बनडायॉक्साइड उत्सर्जन करता है. चीन में यह आंकड़ा 4.5 प्रतिशत है.

इसका मतलब यह नहीं कि भारत जैसे देश पर्यावरण से संबंधित नियमों, जैसे कि क्योटो संधि की शर्तों को अनदेखा कर सकते हैं. पैश कहते हैं कि विकासशील देशों को विकसित देशों से कहना होगा कि वह अपने कार्बन डायोक्साइड उपभोग को 2.7 टन तक कम करें नहीं तो जलवायु की सुरक्षा मुश्किल है. दूसरी ओर, गरीब देशों को अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने के मौके के साथ इस स्तर तक पहुंचने के लिए कुछ विकल्प देने होंगे.

भारत में ऊर्जा की खपत बहुत तेजी से बढ़ रही है. जनसंख्या में बढ़ोतरी और विकास इसकी वजह है. इसलिए भारत में उपभोग पर सवाल उठाना अहम हो गया है. भारत एक चौराहे पर खड़ा है. उसके नागरिकों को एक फैसला लेना है- क्या वे दूसरे देशों की गलतियों से सीखना चाहते हैं और सुधार करना चाहते हैं या फिर वह इसी तरह आगे बढ़ना चाहते हैं.

रिपोर्टः अंजली इस्टवाल/एमजी

संपादनः आभा मोंढे

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