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दुनिया

मरने वाले मुसलमान हैं और मारने वाला सऊदी अरब

हम ऐसे दौर में रह रहे हैं जहां सूचना की बमबारी हो रही है. ध्यान ना दो तो बड़ी खबरें भी पीछे छूट जाती हैं लेकिन इनमें से कई खबरें अपने निशान छोड़ जाती हैं.

आपने ध्यान दिया कि नहीं, पिछले दिनों यमन की राजधानी सना में एक जनाजे के दौरान हवाई हमले में 140 आम लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए? इसके लिए सब सऊदी अरब की तरफ उंगली उठा रहे हैं, क्योंकि वही उन खाड़ी देशों के गठबंधन का नेतृत्व कर रहा है जो यमन में बीते 18 महीनों से बम बरसा रहा है.

जनाजे के दौरान हमले के बाद वहां क्या मंजर था, यह समझने के लिए वहां तैनात एक राहतकर्मी का बयान काफी है, "वह जगह खून की झील में तब्दील हो गई थी.” जब यह हमला हुआ तो वहां हजारों लोग मौजूद थे और ये सब हूथी बागियों की सरकार में गृह मंत्री गलाल अल रवीशान के पिता को अंतिम विदाई दे रहे थे. लेकिन देखते ही देखते मातम का मौका एक नरसंहार में तब्दील हो गया.

सऊदी अरब भले ही अब तक इस हमले में अपना हाथ होने से इनकार कर रहा है, लेकिन सबके संदेह का घेरा उसी के इर्द गिर्द है. इससे पहले भी गठबंधन सेना के लड़ाकू विमानों से यमन में अस्पतालों, स्कूल, फैक्ट्री, बाजारों और आम लोगों के जमा होने वाली अन्य जगहों पर बमबारी की है.

मार्च के महीने में मस्ताबा शहर में एक बाजार में हवाई हमले के दौरान 119 लोग मारे गए थे. इसके अलावा अगस्त महीने में राहत संस्था ‘डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स' ने कहा कि वह उत्तरी यमन में छह अस्पतालों से अपने कर्मचारियों को हटा रहा है क्योंकि गठबंधन सेना ने उनके एक स्वास्थ्य केंद्र को निशाना बनाया है जिसमें 19 लोग मारे गए हैं. संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख जायद अल राद ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि पिछले साल मार्च में जब से सऊदी गठबंधन ने यमन में हमले शुरू किए हैं तब से वहां 3,799 आम लोगों के मारे जाने का अनुमान है और इनमें 60 फीसदी लोग हवाई हमलों में मारे गए हैं.

यमन में सऊदी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ये हमले हूथी बागियों पर कर रही है और इनका मकसद यमन की सरकार की मदद करना है, जो राजधानी सना पर बागियों का कब्जा होने के बाद अब लगभग सऊदी अरब से चल रही है. थोड़ी और महीन तस्वीर देखना चाहते हैं तो ये शिया हूथी बागियों के खिलाफ सुन्नी देशों के गठबंधन के हमले हैं, जिनका मकसद सऊदी अरब के वफादार राष्ट्रपति अब्द रब्बू मंसूर हादी को यमन की सत्ता वापस दिलाना है.

अरब दुनिया में जितने भी संकट इस वक्त चल रहे हैं उनकी बुनियाद कहीं न कहीं शिया और सुन्नियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई नजर आती है. यमन में सऊदी अरब हादी की ‘वैध सरकार' के साथ खड़ा है तो सीरिया में उसे राष्ट्रपति बशर अल असद फूटी आंख नहीं सुहाते, जबकि बहरीन में सुन्नी शासक के खिलाफ शिया जनता के विद्रोह को कुचलने के लिए सऊदी सरकार ने रातोरात सेना भिजवा दी थी. इसी तरह शिया बहुल ईरान यमन में हूथी बागियों के साथ है तो सीरिया में बागी उसे आतंकवादी नजर आते हैं और वह शियाओं के एक समुदाय अलावी से संबंध रखने वाले राष्ट्रपति असद का साथ दे रहा है, तो बहरीन में वह अपने शासक के खिलाफ बगावत पर आमादा शिया जनता के साथ खड़ा नजर आया था.

वर्चस्व की लड़ाई अपनी जगह, लेकिन युद्ध के हालात में आम लोगों की रक्षा करना सभी पक्षों की जिम्मेदारी है, हालांकि युद्ध में सबसे ज्यादा पिसते यही लोग है. लेकिन अस्पतालों, स्कूलों और बाजारों पर हमलों को कैसे जायज ठहराया जा सकता है? सऊदी अरब मध्य पूर्व का सबसे ताकतवर मुसलमान देश है और इस्लाम धर्म के सबसे पवित्र स्थलों का संरक्षक होने के नाते दुनिया भर के मुसलमानों के बीच उसका एक खास स्थान है. इसी साथ उसके कंधों पर अहम जिम्मेदारी भी आती है. लेकिन यमन में उसके नेतृत्व में जिस तरह आम लोगों पर बम बरसाए जा रहे हैं उसमें कोई जिम्मेदारी नहीं दिखाई पड़ती है.

अरब दुनिया में जिस उथल पुथल को पहले अरब स्प्रिंग या हिंदी में अरब वसंत का नाम दिया गया है, वो अब सार्थक नहीं लगता. क्योंकि लोगों से अब इसका कोई सरोकार नहीं दिखता. नजर आता है तो सिर्फ सत्ताओं का एक खेल और विश्व राजनीति का एक अखाड़ा. इस अखाड़े में सिर्फ सऊदी अरब और ईरान ही जोर आजमाइश नहीं कर रहे हैं, बल्कि अमेरिका और रूस भी एक दूसरे को पछाड़ने में जुटे हैं. और पिस रहे हैं आम लोग. अरब क्रांति से ज्यादा अब ये अरब त्रासदी नजर आती है.

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