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दुनिया

मरते हाथियों से बेपरवाह सरकार

उड़ीसा में ट्रेन से कुचल कर सात हाथियों के मरने की घटना ने एक बार हाथियों के मामले में सरकार की लापरवाही जाहिर कर दी है. सरकारी महकमे एक दूसरे पर आरोप लगा कर अपनी जिम्मेदारी खत्म मान रहे हैं.

पश्चिम बंगाल के उत्तरी इलाके में ऐसी घटनाएं सबसे ज्यादा होती हैं. कोई ढाई साल पहले जब यहां ट्रेन से कट कर सात हाथियों की मौत हुई थी तब तत्कालीन वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने मौके के दौरे के बाद यहां दस वाच टावर बनाने के लिए 25 लाख रुपए देने का एलान किया था. इतना वक्त बीत जाने के बाद अब जाकर महज दो वाच टावरों के लिए पांच लाख रुपए आवंटित किए गए हैं. इससे पता चल जाता है कि सरकार ऐसे हादसों को रोकने की दिशा में कितनी गंभीर है.

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के डुआर्स इलाके में अक्सर ऐसी घटनाएं होती रहती हैं. बीते दो सालों में इस इलाके में ट्रेन से कट कर 63 हाथी मारे जा चुके हैं. पर्यावरण मंत्रालय की ऐलीफेंट टास्क फोर्स की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, हाथियों के ट्रेन से कट कर मरने के लिहाज से पश्चिम बंगाल दूसरा सबसे खतरनाक राज्य है. इस मामले में असम अव्वल है जहां सबसे ज्यादा हाथी ट्रेनों की भेंट चढ़े हैं.

Flash-Galerie Indien Eisenbahn Zug in New Delhi

सिलीगुड़ी से अलीपुरदुआर के बीच रेलवे की पटरियां गोरूमारा नेशनल पार्क और जल्दापाड़ा वन्यजीव अभयारण्य से होकर गुजरती है. यह पूरा रूट जंगल के बीच से होकर गुजरता है. यहां यह समस्या बरसों पुरानी है. हर बार ऐसे हादसे के बाद वन विभाग और रेल प्रशासन कुछ दिनों तक सक्रिय रहता है. लेकिन बाद में मामला ठंढे बस्ते में चला जाता है.

डुआर्स इलाके में ट्रेन से कट कर हाथियों की मौत की घटनाएं राज्य सरकार के लिए परेशानी की प्रमुख वजह बनती जा रही है. विधानसभा की स्थायी समिति ने राज्य सरकार को इस सिलसिले में रेलवे से बातचीत करने की सलाह दी है ताकि हाथियों की आवाजाही की राह में पड़ने वाली रेलवे पटरियों को घने जंगल से हटाकर बाहरी हिस्से में लाया जा सके.

केंद्रीय वन व पर्यावरण मंत्रालय ने दो साल पहले हालात का जायजा लेने और उन पर रोक लगाने के उपाय सुझाने के लिए एक सात-सदस्यों की समिति बनाई.  बीते दिनों वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) ने भी ट्रेनों की टक्कर से हाथियों की मौत की वजहों का पता लगाने के लिए एक सर्वेक्षण किया था. उसने अपनी सिफारिशों में डुआर्स इलाके से गुजरने वाली ट्रेनों की रफ्तार कम करने और हाथियों को बचाने के लिए सतर्कता बढ़ाने की बात कही थी. ये तमाम सिफारिशें फाइलों में धूल फांक रही हैं. उस रिपोर्ट में कहा गया था कि ऐसे 33 फीसदी हादसे सुबह, 42 फीसदी शाम को और 17 फीसदी आधी रात के बाद हुए हैं.

राज्य के मुख्य वन संरक्षक उज्जवल भट्टाचार्य बताते हैं, "वन विभाग ने रेलवे के साथ बातचीत में इन मौतों पर अंकुश लगाने के लिए कई सुझाव रखे हैं. इनमें ट्रेनों की गति कम करना और संवेदनशील जगहों यानी गलियारों के दोनों ओर रेलवे पटरियों के किनारे दीवारों का निर्माण शामिल है." डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इलाके में छोटी लाइन को बड़ी लाइन में बदलने के बाद ट्रेनों की रफ्तार बढ़ी है. संगठन ने इन हादसों के लिए वन विभाग और रेलवे कर्मचारियों के बीच तालमेल की कमी को भी जिम्मेदार ठहराया है. उसने हाथियों की आवाजाही के मौसम में उन इलाके में ट्रेनों की गति घटा कर अधिकतम 30 किमी प्रति घंटे करने की सिफारिश की है. इसके अलावा ट्रेन चालक को सतर्क करने के लिए राजाजी नेशनल पार्क की तरह डुआर्स इलाके में भी अर्ली वार्निंग प्रणाली लगाई जानी चाहिए. लेकिन भट्टाचार्य कहते हैं कि ट्रेनों की गति सीमा लागू किए बिना किसी भी उपाय से कोई ठोस नतीजा नहीं निकलेगा.

पश्चिम बंगाल के वन मंत्री हितेन बर्मन मानते हैं कि यह मामला धीरे-धीरे गंभीर होता जा रहा है. वह कहते हैं, "सरकार इस समस्या से वाकिफ है. इसलिए हमने इस पर अंकुश लगाने की दिशा में पहल की है. विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर पूरी तरह अमल किया जाएगा. सरकार इसके लिए रेलवे के अधिकारियों से भी बातचीत करेगी." राज्य के पशु प्रेमियों का कहना है कि इस दिशा में पहल काफी धीमी है. अगर सरकार व वन विभाग ने तेजी नहीं दिखाई तो हाथियों को बचाने के उपायों पर अमल शुरू होने से पहले ही उनकी तादाद घट कर आधी रह जाएगी. हिमालयन नेचर फाउंडेशन के संयोजक अमल बसाक कहते है, "सवाल यह है कि क्या वन विभाग व रेल मंत्रालय ऐसी घटनाओं को रोकने के प्रति सचमुच गंभीर है. अममून ऐसे हादसों के बाद कुछ सक्रियता नजर आती है. लेकिन उसके बाद तमाम फैसले ठंढे बस्ते में डाल दिए जाते हैं."

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: अनवर जमाल अशरफ

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