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दुनिया

ममता ने शुरू की टाटा को लुभाने की कवायद

सिंगुर में ममता बनर्जी ने किसानों की जमीन लौटाने का काम शुरू कर दिया है. इसके साथ ही उन्होंने टाटा मोटर्स को लुभाने की कवायद भी शुरू कर दी. राज्य में कंपनी को एक हजार एकड़ जमीन देने का प्रस्ताव दिया गया है.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद किसानों को टाटा के नैनो प्रोजेक्ट के लिए ली गई जमीन लौटाते हुए कहा कि टाटा आए या बीएमडब्ल्यू, हम सबका स्वागत करेंगे और जमीन मुहैया कराएंगे. उन्होंने टाटा को फैसले के लिए एक महीने का समय दिया है. दिलचस्प बात यह है कि सिंगुर इलाके के युवकों को प्रशिक्षण देने के लिए राज्य सरकार ने बृहस्पतिवार को ही एक आईटीआई की स्थापना के लिए टाटा समूह के साथ करार पर हस्ताक्षर किए हैं.

टाटा को न्योता

सुप्रीम कोर्ट ने बीते महीने नैनो परियोजना के लिए अधिगृहीत एक हजार एकड़ जमीन किसानों को लौटाने का निर्देश दिया था. अब ममता ने टाटा समूह को मेदिनीपुर जिले के ग्वालतोड़ में एक हजार एकड़ जमीन देने की पेशकश करते हुए कहा है कि कंपनी चाहे तो यहां आटोमोबाइल संयंत्र लगा सकती है. उन्होंने टाटा को इस बारे में सोचने के लिए एक महीने का वक्त भी दिया है.

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सिंगुर दिवस के मौके पर किसानों की जमीन लौटाने के लिए आयोजित समारोह में ममता ने कहा, "मैं चाहती हूं कि राज्य में ऑटोमोबाइल उद्योग आए. वह चाहे टाटा हो या फिर बीएमडब्ल्यू. सरकार के पास लैंड बैंक में इसके लिए पर्याप्त जमीन है." उन्होंने कहा कि सरकार किसानों की खेती की जमीन का जबरन अधिग्रहण नहीं करने की अपनी नीति पर अडिग है. लेकिन लैंड बैंक से ऑटोमोबाइल संयंत्र के लिए जमीन दी जा सकती है.

ममता ने टाटा समूह से कहा कि अगर वह बंगाल में संयंत्र लगाना चाहें तो एक महीने के भीतर वित्त मंत्री अमित मित्र या मुख्य सचिव से संपर्क करें. सरकार को उनकी सहायता करने में खुशी होगी. मुख्यमंत्री ने कहा कि हम उद्योगों के खिलाफ नहीं बल्कि जमीन के जबरन अधिग्रहण के खिलाफ हैं. खेती व उद्योग एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, पूरक हैं. राज्य के विकास के हित में इन दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ना चाहिए. मुख्यमंत्री ने कहा, "टाटा बाबू ने अगर उस समय तमाम नियमों और प्रक्रिया का सही तरीके से पालन किया होता तो वह 10 साल पहले ही यहां अपना संयंत्र लगा सकते थे. लेकिन तब सरकार ने जबरन जमीन ली थी." उन्होंने टाटा समूह से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को खेल भावना से लेते हुए राज्य में निवेश के अपने फैसले पर नए सिरे से विचार करने की अपील की.

विडंबना यह है कि ममता ने ठीक उसी सिंगुर से टाटा समूह को लुभाने की कवायद शुरू की है जहां से उनके आंदोलन के चलते ही टाटा समूह को अपनी लखटकिया नैनो परियोजना समेट कर अक्तूबर 2008 में गुजरात जाना पड़ा था. ममता ने वर्ष 2006 में इस परियोजना के लिए किसानों की जमीन के कथित जबरन अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था. बाद में उन्होंने 26 दिनों तक आमरण अनशन भी किया था.

जमीन लौटाई

ममता ने अब से हर साल 14 सितंबर को सिंगुर दिवस मनाने का फैसला किया है. उन्होंने कहा, "मैंने जो वादा किया था, उसे आज पूरा कर दिया है. अब हमारी सरकार इस जमीन को खेती के लायक बनाने में हरसंभव सहायता करेगी." मुख्यमंत्री ने कहा कि इस जमीन को खेती लायक बनाने में अभी कुछ और समय लगेगा. उसके बाद जमीन के मालिक ही फैसला करेंगे कि वह लोग यहां खेती करेंगे या उद्योग लगाएंगे. वह चाहें तो इसे बेच भी सकते हैं. सरकार ने जमीन के खेती लायक नहीं होने तक तमाम प्रभावित परिवारों को दो हजार रुपए महीने के साथ दो रुपए किलो चावल व गेहूं देने का भी फैसला किया है. खेती के लिए उपकरणों की खरीद के लिए सरकार उनको एकमुश्त दस हजार रुपए का अनुदान देगी. इसके अलावा राज्य औद्योगिक विकास निगम प्रभावित किसानों को सिंगुर की जमीन पर छोटे व लघु उद्योगों की स्थापना के लिए 24 लाख रुपए तक का कर्ज देगा.

ममता कहती हैं, "सरकार राज्य के औद्योगिक विकास की राह में सिंगुर को रोड़ा नहीं बनने देगी. यहां हर हाल में उद्योग लगेंगे." उन्होंने स्थानीय लोगों से कहा कि आप हताश मत हों. सरकार आपके साथ है. खेती की सुविधा के लिए यहां एक बांध और कई सिंचाई परियोजनाएं शुरू की जाएंगी. मुख्यमंत्री ने किसानों को सरकार की ओर से मुफ्त बीज और खाद देने का भी एलान किया है. इसके साथ ही किसानों को नई तकनीक और खेती के आधुनिक तरीकों के बारे में भी प्रशिक्षण दिया जाएगा.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि सिंगुर में किसानों की जमीन लौटाने के साथ टाटा को राज्य में निवेश का न्योता देकर ममता बनर्जी ने एक तीर से दो शिकार किए हैं. उन्होंने एक ओर जहां यह संदेश दिया है कि सरकार उद्योगों के खिलाफ नहीं है, वहीं खेती को बढ़ावा देने की मंशा भी जाहिर कर दी है. टाटा को न्योता देकर उन्होंने गेंद अब टाटा समूह के पाले में डाल दी है. पर्यवेक्षकों के मुताबिक, जर्मनी के दौरे से लौटने के बाद ममता अब निर्माण और ऑटोमोबाइल उद्योगों की स्थापना पर खास जोर दे रही हैं. उनकी यह कवायद कितनी रंग लाएगी, यह तो आगे चल कर ही सामने आएगा. लेकिन तब तक ममता व उनकी सरकार की दसों अंगुली घी में और सिर कड़ाही में ही है.

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