मनुष्यों का कैसा हो वसंत | ब्लॉग | DW | 03.02.2014
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ब्लॉग

मनुष्यों का कैसा हो वसंत

वसंत के रोमान न जाने कब से गीतों, कविताओं में दर्ज हैं. लेकिन जहां से ये गीत निकलते हैं यानि उस समाज में वसंत महज एक मौसम है. नई कोंपले नई बहार नई रंगतों का मौसम नहीं, बल्कि क्रूरता अन्याय और नफरत का मौसम.

और ऐसा लगता है मानो ये मौसम 12 महीनों, पूरे साल, साल दर साल बना रहता है. जाता नहीं. 21वीं सदी के दूसरे दशक के अधबीच का ये भारतीय वसंत एक अजीब कशमकश, आशंका और बादलों से घिरा है. सुभद्रा कुमारी चौहान की एक विख्यात कविता है, "वीरों का कैसा हो वसंत". वीरों की जगह अगर कुछ देर के लिए हम मनुष्य रख दें, "मनुष्यो का कैसा हो वसंत". आज के दौर को देख कर शायद यही सवाल हम बार बार पूछना चाहेंगे. खुद से भी, और दूसरों से भी.

दिल्ली में नाना किस्म की वसंत क्रांतियों के बीच होना तो ये चाहिए था कि हाशिए की जगह का भी एक सम्मान होता. लेकिन हम देखते हैं कि मुख्यधारा लगातार उस हाशिए को निगलती जा रही है. पूर्वोत्तर के एक छात्र की पीटने से हुई मौत और मणिपुर की लड़कियों पर हमले और पूर्वोत्तर के छात्रों का विरोध प्रदर्शन इस वसंत की रौनक में कुछ सवाल और बहुत सारा अफसोस छोड़ जाते हैं.

Gedenken Indien Gruppenvergewaltigung Mord 14.12.2013

वंसत के रंगों में घुल रहा है दर्द और प्रताढ़ना का जहर

वसंत की छवियों में सत्ता राजनीति की नोकें चुभ रही हैं. क्या हमारी आकांक्षा का, स्वप्न का और रोमान का ये आखिरी वसंत होगा. ये डर बन गया है. नैतिकता के झंडाबरदार सक्रिय हो उठे हैं. दिल्ली से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से कर्नाटक तक फैले हैं. वे घूमते, बतियाते, टहलते हंसते युवाओं पर नजर रखते हैं. उनकी मंशा को भयानक निगाहों से टटोलते हैं. ऐसा लगता है कि हमें लगातार कोई देख रहा है. जॉर्ज ऑरवेल का "1984" और मिखाइल बुल्गाकोफ का "मास्टर और मार्गारीटा" याद आता है.

इस वसंत में चिड़िया, फूल, लड़के, लड़कियां, पतंग, रंग और कामना आ जा रही हैं, बेशक. लेकिन शैतान भी अपना वसंत हमारे वसंत की मासूमियत में घोल रहा है. रघुबीर सहाय की एक छोटी सी कविता हैः

वही आदर्श मौसम

और मन में कुछ टूटता सा

अनुभव से जानता हूं कि यह वसंत है.

कुछ कुछ निजी दर्द के हवाले से लिखी ये कविता समकालीन समय की तकलीफ की एक गहरी झकझोर भी बन जाती है. यही वे सच्ची लाइनें हैं जिनमें हमारा आज का वसंत नुमाया है. बिगड़ी हुई हवाओं के बावजूद वसंत कुदरत के रंगों में अपनी पीलेपन की विविध छटाओं से खिल रहा है, उतना ही वो हमारे भीतर उस अद्भुत कलाकार विंसेंट फान गॉग के पीलेपन की तरह टूटा और बिखरा हुआ है.

ये वसंत अंत में यही बताता है जो अंतोनियो ग्राम्शी ने कहा था, "मैं बौद्धिक तौर पर निराशावादी लेकिन इरादों से आशावादी हूं." आशय ये है कि भूमंडलीकृत सांस्कृतिक आधिपत्य आपके सामने जो चीजें लगातार फेंकता जाता है उन्हें ही आप सच न मानें और संदेह करें, सवाल करते रहें और इरादे सकारात्मक हों. इस तरह बुद्धि का निराशावाद और संकल्प का आशावाद पराजित हो जाने और अपने में दुबक जाने की निष्क्रियता नहीं है. इसमें एक किरण झांकती रहती है. कई किस्म के वज्रपात के वक्तों में मनुष्यों का वसंत शायद ऐसा ही होता हो.

वसंत के आगमन को सरस्वती की आराधना से भी जोड़ते हैं. तो ये कामना का ही नहीं, बुद्धि, ज्ञान और विवेक का भी वसंत है. ये चीजें बाजार में नहीं मिलती. वसंत को वैलेंटाइन की सदाशयता में जाने से बाजार रोकता है. प्रेम की और पूजा की पवित्रता को तो कायम रखना ही होगा. वसंत बिगड़ैल प्यार का पोषक नहीं है. पहाड़ी अंचल के एक गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी के एक गीत के बोल हैं, "बसंत ऋतु में जैई"

Bildgalerie Farsi - Blume

फूलों में खिलती है वसंत की रौनक

मेरा डांडी कान्ठ्यूं का मुलुक जैल्यु बसंत ऋतु मा जैई,

बसंत ऋतु मा जैई....

हैरा बणु मा बुरांशी का फूल जब बणाग लगाणा होला,

भीटा पाखों थैं फ्यूंली का फूल पिंगल़ा रंग मा रंगाणा होला,

लय्या पय्यां ग्वीर्याळ फुलू न होली धरती सजीं देखि ऐई. बसंत ऋतु मा जैई.....

(मेरे पहाड़ों में जब भी जाना चाहो तो वसंत ऋतु में जाना. जब हरे भरे जंगलों में गाढ़े लाल रंगों में खिले बुरांश के फूल वनाग्नि जैसे दिखेंगे. घाटियों को फ्योंली के फूल बासंती रंग में रंग रहे होंगे और धरती सरसों, पय्यां और कचनार के फूलों से रंगी अपनी सुन्दरता का बयान कर रही होगी.)

अब अगर आप गौर से देखें तो वसंत की ये छटा एक पहाड़, एक भूगोल की नहीं है. शायद दुनिया में हर कहीं अपनी अपनी भाषा, बोली और अपने अपने फूलों पेड़ों में वसंत ऐसे ही आता होगा. तो वसंत को क्यों न उसके इस कोमल और मीठे दर्द से भरे आह्वान के साथ रहने दिया जाए. क्यों न उसमें वीरानी और इंतजार के अहसासों को दूर से देखा जाए. वही तो उसके रंग हैं. मनुष्यों का वसंत शायद ऐसा भी होता हो.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

संपादनः अनवर जे अशरफ

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