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ब्लॉग

मनमोहन ओबामा की मुश्किल मुलाकात

शुक्रवार को वॉशिंगटन में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिल रहे हैं॰ दूसरे कार्यकाल के अंत में मनमोहन सिंह की ओबामा से यह अंतिम मुलाकात हो सकती है.

मनमोहन सिंह संयुक्त राष्ट्र महासभा में शामिल होने अमेरिका में हैं लेकिन इस अवसर का इस्तेमाल ओबामा और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ बातचीत के लिए भी किया जा रहा है॰ हालांकि पिछले चार वर्षों में सिंह और ओबामा के बीच यह तीसरी मुलाकात होगी, लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि भारत और अमेरिका के बीच बहुत गर्मजोशी वाले घनिष्ठ संबंध हैं॰ स्थिति इससे ठीक उल्टी है और दोनों ही देश आपसी संबंधों में आए ठंडेपन और गतिरोध को दूर करने के उपाय सोच रहे हैं॰

अपने पहले कार्यकाल में मनमोहन सिंह ने विपक्षी भारतीय जनता पार्टी और सहयोगी वाम दलों के कड़े विरोध के बावजूद अमेरिका के साथ परमाणु ऊर्जा करार करके दोनों देशों के संबंधों को एक नई ऊंचाई तक ले जाने का काम किया था और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी विकसित करने की प्रक्रिया की शुरुआत की थी॰ उनके दूसरे कार्यकाल में यह प्रक्रिया बेहद धीमी पड़ गई और ऐसा लगा कि उनकी सरकार में इसे आगे ले जाने की इच्छाशक्ति का अभाव है॰ उधर ओबामा प्रशासन भी भारत के प्रति कमोबेश उदासीन-सा है और पिछले चार वर्षों के भीतर अमेरिका में भारत समर्थक तत्व भी लगभग निष्क्रिय हो गए हैं॰

परमाणु करार के बाद दोनों देशों को एक-दूसरे से जो आशाएं थीं, वे भी पूरी नहीं हुईं॰ अमेरिकी कंपनियों को उम्मीद थी कि भारत परमाणु संयंत्र खरीदेगा और भारत को उम्मीद थी कि उसे अति उन्नत तकनीक मिलेगी, लेकिन बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका में परमाणु अप्रसार लॉबी मजबूत हो गई. यह मांग उठने लगी कि भारत पहले परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करे, उसके बाद ही उसे उच्च तकनीक दी जा सकती है॰ उधर भारतीय संसद में 2010 में पारित परमाणु दायित्व कानून के कारण अमेरिकी कंपनियां भारत में परमाणु संयंत्र लगाने से कतरा रही हैं क्योंकि किसी प्रकार की दुर्घटना होने की स्थिति में उन्हें बहुत अधिक मुआवजा देना होगा॰ एटॉर्नी जनरल गुलाम वाहनवती ने राय दी है कि भारतीय कंपनियां विदेशी कंपनियों के साथ सौदा करते समय दायित्व तय कर सकती हैं॰ इसका भारी विरोध हो रहा है और राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने कहा है कि यदि ऐसा किया गया तो इसे “रिश्वत” का मामला माना जाएगा.

माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमेरिका यात्रा के दौरान भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम लिमिटेड और अमेरिकी कंपनी वेस्टिंगहाउस के बीच 102 करोड़ रु॰ के प्राथमिक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए जाएंगे और मनमोहन सिंह ओबामा को आश्वस्त करेंगे कि सरकार परमाणु दायित्व कानून को अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार के अनुरूप ही लागू करेगा॰ अमेरिका ने भारत के साथ मिलकर हथियार प्रणालियों के विकास एवं उत्पादन का प्रस्ताव किया है जिसे भारत इस शर्त पर स्वीकार करेगा कि उसे अत्याधुनिक तकनीकी का अधिकतम हस्तांतरण किया जाए॰

अगले वर्ष भारत में चुनाव होने जा रहे हैं॰ माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री के रूप में संभवतः यह मनमोहन सिंह की अंतिम अमेरिका यात्रा है॰ नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी घोषित होने के बाद दिन-ब-दिन चुनावी माहौल गर्माता जा रहा है॰ ऐसे में मनमोहन सिंह के लिए अमेरिका को बहुत अधिक रियायतें देना मुश्किल होगा॰ यूं भी अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सूजन राइस और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन के हाल के बयानों से स्पष्ट है कि दोनों देशों के बीच अनेक मुद्दों पर गंभीर मतभेद हैं और इनके शीघ्र सुलझने की आशा नहीं की जा सकती॰ अमेरिका अफगानिस्तान छोड़ने से पहले किसी भी सूरत में तालिबान के साथ समझौता करने पर आमादा है॰ इससे भारत के लिए बेहद गंभीर दुष्परिणाम निकलेंगे लेकिन अफगानिस्तान पर अमेरिका भारत के साथ कभी भी सलाह-मशविरा नहीं करता॰

भारत और अमेरिका को एक-दूसरे का “नैसर्गिक सहयोगी” कहा जाता है और दोनों ही विश्व के दो बड़े लोकतांत्रिकक देश हैं, लेकिन अकसर उनका सहयोग वर्तमान के बजाय भविष्य में नजर आता है॰ दरअसल राष्ट्रों के बीच सहयोग का संबंध साझा जीवनमूल्यों पर नहीं बल्कि साझा हितों पर आधारित होता है॰ अमेरिका को पूरी तरह से एहसास है कि भारत कभी भी उसका वैसा सहयोगी नहीं बन पाएगा जैसा जापान, जर्मनी, ब्रिटेन या ऑस्ट्रेलिया है॰ हालांकि उसे यह भी पता है कि भारत की आर्थिक एवं सैन्य शक्ति में वृद्धि अंतत: अमेरिका के ही हित में रहेगी क्योंकि वह उसके जरिये चीन को “संतुलित” कर सकेगा॰ चीन भी इसी तरह भारत को “संतुलित” करने के लिए दक्षिण एशिया के छोटे देशों की आर्थिक एवं सैन्य शक्ति के विकास में सहयोग कर रहा है॰ पाकिस्तान के मुद्दे पर अमेरिका और भारत के हित एक बिन्दु पर आकर नहीं मिलते। इसलिए उस पर दोनों देशों के बीच मतभेद बने रहेंगे॰

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच शुक्रवार को होने जा रही “शिखर वार्ता” का मुख्यतः प्रतीकात्मक महत्व ही है क्योंकि यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि चार साल से अधिक निष्क्रिय रहने के बाद अपने कार्यकाल के अंतिम महीनों में मनमोहन सिंह कोई ऐसी उल्लेखनीय पहल कर पाएंगे जो भारत-अमेरिका संबंधों को एक नई ऊंचाई तक ले जाये॰ हां, रक्षा उपकरणों की खरीद के कई बड़े समझौते होने की उम्मीद जरूर की जा रही है जिनसे अमेरिकी कंपनियों को कुछ संतोष होगा॰ द्विपक्षीय निवेश संधि पर वार्ता के लिए भी भारत अपनी रजामंदी प्रकट करेगा॰ अमेरिकी कंपनियों को भारतीय बाजार तक पहुंच मुहैया करने पर भी मनमोहन सिंह ओबामा को आश्वस्त करेंगे, ऐसी आशा की जा रही है॰

ब्लॉग: कुलदीप कुमार, नई दिल्ली

संपादन: निखिल रंजन

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