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दुनिया

मनमर्जी से दवा खाने में अव्वल

भारत में लोग डॉक्टर को भगवान मानते हैं लेकिन डॉक्टरों के परामर्श को नजरअंदाज करने में भी उनका कोई सानी नहीं है. डॉक्टर की सलाह के बगैर दवाई खाने के मामले में भारतीयों से आगे शायद ही कोई हो.

भारत में इलाज की सुविधाओं के बारे में हाल ही में आईएमएस हेल्थ की ओर से हुए एक सर्वेक्षण से पता चला है यहां 42 प्रतिशत दवा की दुकानें देश के सबसे अधिक जनसंख्या वाले नौ शहरों में हैं और इनमें 29 प्रतिशत दवाइयां डॉक्टर के पर्चे के बगैर बिकती हैं. सर्वे से यह भी सामने आया है कि 37 फीसदी दवा दुकानें नर्सिंग होम, अस्पताल या किसी डॉक्टर की क्लिनिक के पास ही स्थित हैं.
पढ़े लिखे लोग आगे
बड़े शहरों में लोग धड़ल्ले से बिना पर्ची दवाई खरीदते हैं और दवा दुकानदार भी बिना पर्ची दवाईयां बेचने में कोई गुरेज नहीं करते. मेडिकल स्टोर चलाने वालों का कहना है कि बिना पर्ची दवाई लेने वालों में पढ़े लिखे लोग आगे हैं. नवी मुंबई में दवा दुकान चलाने वाले संजय चौधरी कहते हैं कि पढ़े लिखे लोगों का आत्मविश्वास और दवाइयों के बारे में उनकी जानकारी के कारण कई बार धोखा हो जाता है, लगता है कि, वे पर्ची भूल आये हैं. वे बताते हैं, "मेरी दुकान में बिना पर्ची दवाई नहीं बेची जाती."
फार्मासिस्ट विनय दवे का मानना है कि जिन दवाओं का उपयोग बहुत ही सोच समझकर किया जाना चाहिए, ऐसी दवाइयों को बिना परामर्श लेना अपनी हाथों से मौत को आमंत्रित करने के समान है. उनका कहना है मुंबई में कानून की सख्ती के कारण बिना पर्ची दवाई बेचना संभव नहीं है.
दांतों के डॉक्टर सतीश शुक्ल कहते हैं कि ज्यादातर मरीज थोड़ा लाभ होने की स्थिति में डॉक्टरों के पास दुबारा नहीं आते. फिर उन्हीं लक्षणों के उभरने पर अपने अनुभव से दवाई खा लेते हैं.ऐसी लापरवाही घातक साबित हो सकती है.


डॉक्टर की पर्ची के बिना दवाई लेने पर रोक को गलत मानने वालों की कमी नहीं है. सर्दी, बुखार, वायरल, त्वचा से जुड़े रोगों में लोग डॉक्टर के पास जाने से पहले खुद या दवा विक्रेता की सलाह पर दवाई खा लेते हैं. मुंबई में रहने वाली कल्पना सिंह इसके लिए डॉक्टरों की व्यावसायिक प्रवृत्ति को ज़िम्मेदार बताती हैं.उनका कहना है कि, "आज के डॉक्टर तिल का ताड़ बना कर मरीजों की जेब खाली करते हैं, इसीलिए जब तक ज़रूरी न हो वे डॉक्टर के पास जाने से परहेज करती हैं."
मुंबई सबसे महंगा शहर
यूं तो देश की वित्तीय राजधानी मुंबई को दुनिया के सबसे कम महंगे महानगरों में शुमार किया जाता है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में यह देश का सबसे महंगा शहर है. देश के अन्य शहरों के मुकाबले मुंबई में चिकित्सा सेवा बीस से चालीस फीसदी तक महंगी है. इस सर्वे के अनुसार समान्य डॉक्टरों की फीस ही अन्य शहरों के डॉक्टरों के मुकाबले बीस फीसदी ज्यादा है.विशेषज्ञ डॉक्टरों के मामले में यह फीस चालीस फीसदी तक ज्यादा है. डॉ आदित्य कहते हैं, "इसके लिए डॉक्टर नहीं बल्कि यहां रहने का खर्च जिम्मेदार है, दूसरे शहरों के मुकाबले यहाँ हर चीज़ महंगी है." अब देश के कई छोटे शहरों में कम कीमत में बढ़िया इलाज उपलब्ध है. स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के बाद बड़े महानगरों के अलावा वेलूर, हैदराबाद, विशाखापट्टनम, लखनऊ, भुवनेश्वर, चंडीगढ़, भोपाल और रायपुर जैसे शहरों में बेहतर इलाज हो रहा है.

मरीजों और चिकित्सकों का अनुपात

सर्वे के अनुसार देश के 120 बड़े शहरों में से 76 शहरों में मरीजों और डॉक्टरों का अनुपात वैश्विक अनुपात से अधिक है जबकि 44 शहरों में यह अनुपात वैश्विक अनुपात से कम है. वैसे पूरे देश के सन्दर्भ में इसे देखा जाय तो भारत इस मामले में काफी पीछे है. चिकित्सा के क्षेत्र में इतनी तरक्की करने के बावजूद भारत में प्रति हजार केवल 0.65 डॉक्टर हैं जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकडा 1.23 डाक्टर प्रति हजार का है.

इस सर्वेक्षण में ग्रामीण क्षेत्रों को शामिल नहीं किया गया था लेकिन यदि इसे शामिल कर लिया जाय तो देश में डॉक्टरों, नर्सों और सार्वजनिक स्वास्थ्य पेशेवरों की भारी कमी है. खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस कमी को देश के सभी लोगों तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने में एक बड़ी बाधा मानते हैं. सरकार मानती है कि 1000 की आबादी पर एक डॉक्टर और तीन नर्स प्रति डॉक्टर होने चाहिए. देश में अभी 2000 लोगों की आबादी पर एक डॉक्टर और प्रति दो चिकित्सकों पर तीन नर्सें ही हैं.

रिपोर्ट: विश्वरत्न, मुंबई

संपादनः एन रंजन

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