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दुनिया

मध्य एशिया से जा रहे हैं हजारों आईएस में

इस्लामी स्टेट का कहर जारी है. हाल में मध्य एशिया के करीब 2000 लोग आईएस में शामिल हुए हैं. मध्य एशिया विशेषज्ञ डियोड्रा टायनन के अनुसार गरीबी का शिकार यह इलाका आईएस के विदेशी लड़ाकों का सबसे बड़ा स्रोत बन गया है.

सीरिया और इराक के विवादों से पैदा हुई स्थिति मध्य एशियाई देशों के लिए गंभीर सुरक्षा चुनौती बन गई है. भ्रष्टाचार में डूबे पूर्व सोवियत संघ के पांच देशों, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उजेबेकिस्तान ने इस्लामी चरमपंथ की समस्या से निबटने के लिए कुछ नहीं किया है. अंतरराष्ट्रीय क्राइसिस ग्रुप ने अपनी हाल की रिपोर्ट में कहा है कि आईएस मध्य एशिया के लोगों को सीरिया बुला रहा है और इलाके के चरमपंथियों के बीच नए संपर्क बना रहा है. रिपोर्ट के अनुसार इलाके के 2000 से 4000 लोग आईएस की मदद के लिए सीरिया गए हैं.

अंतरराष्ट्रीय क्राइसिस ग्रुप के मध्य एशिया प्रोजेक्ट डाइरेक्टर डियोड्रा टायनन ने डॉयचे वेले के साथ इंटरव्यू में कहा कि आईएस के मध्य एशिया में रंगरूटों की भर्ती करना अफगानिस्तान या पाकिस्तान से ज्यादा आसान है.

डॉयचे वेले: इस्लामिक स्टेट के ये समर्थक कहां से रहे हैं?

डायर्ड्रे तायनान: मध्य एशियाई सरकारों का कुछ सौ लड़ाकों का आकलन बहुत रूढ़िवादी लगता है. पश्चिमी देशों के अधिकारी यह संख्या 2000 बताते हैं लेकिन यह 4000 तक हो सकती है. सबसे बड़ा दल उज्बेकों का है जो 2500 तक हो सकता है. ओश इलाके से करीब 1000 पुरुष और महिलाएं लड़ने के लिए या आईएस को मानवीय सहायता देने के लिए गए हैं.

इलाके के सामान्य आईएस समर्थक की आप क्या व्याख्या करेंगे?

आईएस समर्थक का कोई एक प्रोफाइल नहीं है. मध्य एशियाई देश अक्सर यह नहीं समझ पाते कि आईएस समाज के विभिन्न वर्गों को अपील कर रहा है. उनमें 17 साल की हेयरड्रेसर हैं, स्थापित कारोबारी हैं, पतियों द्वारा छोड़ी गई महिलाएं हैं, ऐसे परिवार हैं जो समझते हैं कि उनके बच्चों का भविष्य खिलाफत में बेहतर है, युवा लोग हैं और यूनिवर्सिटी के छात्र भी. उन सबकी प्रेरणा यह है कि सोवियत संघ के बाद की जिंदगी का इस्लामिक स्टेट अच्छा विकल्प है. आईएस के लिए मध्य एशिया में रंगरूटों की भर्ती अफगानिस्तान या पाकिस्तान के मुकाबले ज्यादा आसान है.

अपना देश छोड़कर आईएस की मदद करने की वजह क्या है?

इसकी वजह कुछ हद तक समाज में हाशिए पर जाना और आर्थिक बदहाली है. आईएस सिर्फ उनको आकर्षित नहीं कर रहा जो लड़ाई का अनुभव पाना चाहते हैं लेकिन उनको भी जो उद्देश्यपूर्ण और धर्मनिष्ठ जिंदगी चाहते हैं. महिलाओं का चरमपंथ की ओर आकर्षित होने की वजह मध्य एशिया में उनके लिए सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक अवसरों का अभाव है. मध्य एशिया में आईएस से सहानुभूति रखने वाले चरमपंथी धार्मिक विचारधारा से प्रेरित हैं. चरमपंथी रुझान धार्मिक शिक्षा के अभाव और इलाके की धर्मनिरपेक्ष सरकारों से शिकायतों की वजह से बढ़ रही है. हालांकि सामाजिक और आर्थिक कारणों की भूमिका है लेकिन इस्लाम को आगे बढ़ाने के लिए जिहाद का विचार बहुत से लोगों के लिए आईएस के आकर्षण की वजह है.

इन समर्थकों की भर्ती कैसे की जा रही है?

चरमपंथी लक्ष्यों की भर्ती मस्जिदों और नमाजखानों में हो रही है. इंटरनेट और सोशल मीडिया की भी भूमिका है. कुछ लोगों की भर्ती घर पर ही हो रही है, जबकि दूसरे विदेशों में चरमपंथ की ओर आकर्षित हो रहे हैं. भर्ती मुख्य रूप से मध्य एशिया, रूस और तुर्की में हो रही है, और धार्मिक शिक्षा के लिए मिस्रे, सउदी अरब और बांग्लादेश जाने वाले युवा लोगों के बीच से भी.

ये रंगरूट किस तरह से आईएस की मदद कर रहे हैं?

कुछ लोग लड़ते हैं, दूसरे लोग कॉकेशिया और अरब देशों के अनुभवी लड़ाकों को समर्थन देने का काम करते हैं. आईएस का कहना है कि उसे सिर्फ लड़ाकों की नहीं बल्कि शिक्षकों, नर्सों और इंजीनियरों की भी जरूरत है. यह पढ़े लिखे लोगों को आकर्षित करता है.

इससे मध्य एशिया के देशों की सरकारों के लिए क्या समस्या खड़ी हो रही है?

लड़ाई की ट्रेनिंग पाने वाले और आईएस की कमान संरचना से गुजरने वाले मध्य एशियाई लोगों की संख्या बढ़ रही है. इसके साथ जिहादी नेटवर्क भी बढ़ रहा है जिसके वे हिस्सा हैं. हालंकि ज्यादातर मध्य एशियाई जातीय और भाषआई जमातों में रहते हैं लेकिन इसकी वजह से पूर्व सोवियत संघ, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और चीन के शिनजियांग के इलाके में सहयोग करने वाले लड़ाकों का बड़ा बटालियन बन गया है. मध्य एशिया की सरकारें इनसे सुरक्षा खतरों का सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं.

डियोड्रा टायनन अंतरराष्ट्रीय क्राइसिस ग्रुप में मध्य एशिया प्रोजेक्ट के डाइरेक्टर हैं.

इंटरव्यू: गाब्रिएल डोमिंगेज

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