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विज्ञान

मधुमक्खियों की आबादी बढ़ाने की जरूरत

बायोईंधन उत्पादन को बढ़ाने के लिए यूरोप को अपने यहां मधुमक्खियों की जरूरत है, लेकिन फिलहाल वे बहुत कम हैं. उनके होने से बायोईंधन और बेहतर फसल मिलने के अलावा पर्यावरण प्रदूषण को भी काबू में किया जा सकेगा.

मधुमक्खियां पालने वालों के अलावा पर्यावरण कार्यकर्ता और वैज्ञानिकों का भी मानना है कि यूरोप में मधुमक्खियों की इतनी कमी है कि कुछ समय में परागण के लिए भी ये कम पड़ जाएंगी. ऐसे में फल और सब्जिों की भी कमी हो सकती है. हालांकि दुनिया भर में मक्खियों की संख्या में पिछले कुछ सालों में औसतन करीब सात फीसदी बढ़ोतरी हुई है.

घटती आबादी का कारण

श्टुटगार्ट में होहेनहाइम यूनिवर्सिटी के पेटर रोजेनक्रांस के अनुसार संख्या में यह वृद्धि मधुमक्खी पालन की वजह से आई है. उन्होंने डॉयचे वेले को बताया कि मधुमक्खियों की कुल 95 फीसदी आबादी मधुमक्खी पालकों के हाथ में है. बीते कुछ सालों में मधुमक्खी पालकों को काफी नुकसान उठाना पड़ा है. इसके लिए एक खास रसायन 'नियोनिकोटिनॉयड' जिम्मेदार है जो कीटनाशकों में मिला होता है. इसके कारण मधुमक्खियां कमजोर हो रही हैं और कई कीटाणुओं के कारण बीमार भी हो रही है. सर्दियों में करीब 30 फीसदी मक्खियां मर जाती हैं और बसंत में और पैदा होती हैं.

हालांकि यूरोपीय संघ में कीटनाशकों पर लागू प्रतिबंध इसी तरह के नुकसान को कम करने के लिए है. ज्यादा समस्या जंगली मधुमक्खियों की संख्या में कमी है. इनकी करीब 500 प्रजातियां जर्मनी में पाई जाती हैं. लेकिन जिन इलाकों में औद्योगिक स्तर पर खेती हो रही है वहां बड़े पैमाने पर कीटनाशक छिड़के जाते हैं जिससे जंगली मक्खियों की संख्या में भारी कमी आई है.

फायदे की बात

अक्सर काम में तल्लीन इंसान को मधुमक्खी की तरह व्यस्त होने का ताना दिया जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि मधुमक्खियां मेहनती जीव के रूप में मशहूर हैं. अपने दिन का अधिकांश हिस्सा वे पराग जमा करने और दूसरे फूलों तक पहुंचाने में खर्च करती हैं. इनका पालन करने वालों को इनसे शहद के अलावा खेती में अच्छी फसल में मदद मिलती है. रोजेमक्रांस मानते हैं कि परिस्थिति में सुधार लाया जा सकता है ताकि कीटनाशकों के कारण मधुमक्खियों की संख्या में आ रही कमी को रोका जा सके.

हाल में प्लोस वन पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों ने बायोईंधन का उत्पादन बढ़ाने के लिए मक्खियों द्वारा सरसों, सूर्यमुखी और मक्के की फसलों के ज्यादा परागण की आवश्यक्ता जताई थी. रोजेनक्रांस भी मानते हैं कि यह सही सोच है. उदाहरण के तौर पर अगर सरसों के खेतों में योजना के अनुसार संख्या में मक्खियां हों तो पैदावार 30 से 40 फीसदी बढ़ सकती है. इसके लिए किसानों को अपनी जरूरत के अनुसार मक्खियां मंगवाने की जरूरत है और इसकी उन्हें कीमत चुकानी होती है. इस तरह की व्यवस्था अमेरिका और चीन में पहले से मौजूद है और अब यूरोप में भी प्रचलन में आ रही है. बायोईंधन के लिए किसान ज्यादा से ज्यादा मक्के की पैदावार में दिलचस्पी ले रहे हैं.

रिपोर्ट: यूडिथ हार्टल/एसएफ

संपादन: ईशा भाटिया

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