1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

मद्रास कैफे पर चर्चा तेज

नई फिल्म मद्रास कैफे के साथ बॉलीवुड एक बार फिर विवादों की गली में मुड़ता दिख रहा है. फिल्म श्रीलंकाई गृहयुद्ध में जिस तरह से विद्रोहियों को दिखा रही है उसने भारतीय तमिल लोगों में चिंता बढ़ा दी है.

जॉन अब्राहम इस फिल्म में भारतीय खुफिया अधिकारी बने हैं. फिल्म की कहानी उस दौर की है जब 1990 में भारतीय शांति सैनिक तीन साल तक तमिल विद्रोहियों से लड़ने के बाद वापस आ गए थे. फिल्म निर्देशक शुजित सरकार ने बताया कि दक्षिण पश्चिमी राज्य केरल में मद्रास कैफे की शूटिंग हुई है. शुजित के मुताबिक, "यह विशुद्ध राजनीतिक फिल्म है जो साजिश, जासूसी, सूचनाओं की कोडिंग डिकोडिंग जैसे मुद्दों से होकर गुजरती और उनकी पड़ताल करती है."

भारत के दक्षिण में राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय तमिल आबादी रहती है. दक्षिण भारतीय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिंसक विवाद में विद्रोहियों को जिस तरह से दिखाया गया है उस पर पहले ही चिंता जताई है. हालांकि सरकार कहते हैं कि 1990 के शुरुआती दशक को दिखाती उनकी फिल्म "किसी का पक्ष नहीं लेती. बड़ा संदेश यह है कि किसी गृहयुद्ध में आम नागरिकों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है."

फिल्म का मुख्य किरदार तो काल्पनिक है लेकिन सरकार का कहना है उन्होंने, "वास्तविक संदर्भों का इस्तेमाल कर विद्रोही गुटों, आजादी की लड़ाई लड़ने वाले क्रांतिकारियों और भारतीय शांति सेना की छवि बनाई है और यह दिखाया है कि कैसे भारत इस मामले में पड़ गया."

Rajiv Gandhi Attentat Letztes Foto

श्रीलंका में 1983 से तेज हुई लिट्टे और सरकार की जंग में करीब एक लाख लोगों को जान गई. दोनों पक्ष एक दूसरे पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हैं. 1987 में भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विवाद निपटाने के लिए शांति सैनिकों को भेजा लेकिन यह कोशिश नाकाम रही. इस कदम की बड़ी आलोचना भी हुई और दोनों पड़ोसियों के रिश्ते में तनाव भी आया. 1991 में जब राजीव गांधी की हत्या हुई तो लिट्टे ही मुख्य संदिग्ध था.

राजीव गांधी की हत्या का जिक्र फिल्म में है या नहीं इस पर सरकार ने कुछ नहीं बताया. उन्होंने बस इतना कहा, "फिल्म कहां खत्म होती है और आगे बढ़ती है यही तो फिल्म का रहस्य है." हालांकि इस हत्या ने भारतीय इतिहास का रुख बदल दिया, लेकिन बहुत कम ही फिल्में हैं जो राजीव गांधी की मौत, तमिल लड़ाके या श्रीलंकाई विवाद पर बनी हैं.

तमिल भाषा में "कुत्रापत्रिकाइ" फिल्म बनी थी जो राजीव गांधी की हत्या और गृह युद्ध पर बनी थी. उसे सेंसर ने राजनीतिक विवाद के बाद रोक दिया. फिल्म 13 साल तक अटके रहने के बाद 2007 में रिलीज तो हुई लेकिन काफी काट छांट के बाद. 1999 में तमिल फिल्म द टेररिस्ट भी इस हत्याकांड पर थी, जबकि 2002 में मणि रत्नम की बनाई "कन्नाथील मुथामित्तल" एक ऐसी लड़की की कहानी थी जो श्रीलंकाई गृह युद्ध में बिछड़े मां बाप को तलाश करती है. फिल्म को कई अवॉर्ड मिले.

हिंदी फिल्में आमतौर पर जब भी सीमा पार विवादों की तरफ बढ़ती हैं तो उन्हें पाकिस्तान और कश्मीर का विवादित इलाका ही नजर आता है. सरकार कहते हैं कि वो जासूसी अभियान के लिए अलग जगह चाहते थे. सरकार ने कहा, "मैं आमतौर पर दिखने वाली भारत पाकिस्तान पृष्ठभूमि नहीं चाहता था, मैं इस संकट पर लंबे समय से नजर रख रहा था और इसे मुख्य कहानी में लाना चाहता था." फिल्म ने सेंसर बोर्ड की बाधा तो पार कर ली है लेकिन इसे दक्षिणी राज्य तमिल नाडु में संकट झेलना पड़ सकता है. नाम तमिलियर नाम के कार्यकर्ताओं के संगठन ने राज्य सरकार से फिल्म पर रोक लगाने की मांग की है. संगठन ने कहा है कि फिल्म के ट्रेलर में एलटीटीई को "आतंकवादी" की तरह दिखाया जा रहा है. गुट का नेतृत्व करने वाले फिल्मकार सेबास्टियन सीमान ने कहा है, "रिलीज होने से पहले हम फिल्म देखना चाहेंगे. अगर कोई आपत्तिजनक दृश्य नहीं हुआ" तो फिल्म रिलीज होने दी जाएगी. उधर फिल्म के नायक जॉन अब्राहम ने कहा है कि वो तमिलनाडु में एक प्रेस कांफ्रेंस कर विवाद को ठंडा करने की कोशिश करेंगे.

एनआर/एमजे (एएफपी)

DW.COM