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विज्ञान

मजाक करने और उड़ाने में फर्क

कभी ना कभी यह संदेह हर किसी के मन में पैदा होता है, क्या यह व्यक्ति सिर्फ मजाक कर रहा है या बातों बातों में मेरा मजाक उड़ा रहा है? हमारे दिमाग के लिए इस फर्क को समझना कोई आसान काम नहीं है.

कई लोग शब्दों के साथ खूब अच्छी तरह खेल सकते हैं, इतना कि एक ही वाक्य के दो अलग अलग मतलब भी निकल आते हैं. भाषा के इस हुनर को वे लोगों को नीचा दिखाने के लिए भी बहुत आसानी से इस्तेमाल कर लेते हैं. इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें शब्दों का यह खेल समझ ही नहीं आता. उनके लिए यह समझ पाना भी मुश्किल होता है कि सामने वाले की बात का दोहरा मतलब था क्या.

जर्मनी के ट्यूबिंगन में वैज्ञानिक इस बात का पता लगा रहे हैं कि दिमाग हंसी के अलग अलग संकेतों को किस तरह से पढ़ता है. अमेरिका की 'प्लोस वन' नाम की विज्ञान पत्रिका में छपे एक लेख में इस रिसर्च के बारे में बताया गया है. सूचना के आदान प्रदान के लिए इंसान का बात करना ही जरूरी नहीं है, इशारों से या फिर चेहरे के हाव भाव से भी कई तरह के संदेश दिए जा सकते हैं. इसे 'नॉन वर्बल कम्यूनिकेशन' कहा जाता है. लेख में कहा गया है कि दिमाग सकारात्मक और नकारात्मक संदेशों को अलग अलग तरह से आंकता है.

ट्यूबिंगन यूनिवर्सिटी के डिर्क विल्डग्रूबर हंसी से दिमाग में होने वाली प्रतिक्रिया पर शोध कर रहे हैं. वह बताते हैं, "जब बात समाज में मेल जोल की आती है तो हंसी एक बेहद जरूरी भूमिका निभाती है. यदि लोग मुस्कुरा कर मिलें तो इंसान को लगता है कि उसे अपनाया जा रहा है. लेकिन वहीं अगर उसे ताना दिया जाए या हंसी बनावटी हो तो वह खुद को उस समूह से अलग मानता है".

मनोचिकित्सा में मददगार

विल्डग्रूबर जानवरों में भी हंसी के पैटर्न पर शोध कर रहे हैं, "मिसाल के तौर पर जानवरों में यह देखा जा सकता है कि वह एक दूसरे के साथ खेलते हैं, एक दूसरे को भाग कर पकड़ते है. यह शिकार सीखने का उनका तरीका होता है. जानवरों में मुस्कराहट एक इनाम की तरह होती है जो माता पिता बच्चों को देते हैं और उन्हें आगे के खतरों के लिए तैयार करते हैं". शोध में देखा गया है कि बंदरों के अलावा चूहों के बच्चे भी मुस्कुराते हैं.

विल्डग्रूबर की टीम ने देखा की अलग अलग तरह की हंसी की आवाज पर दिमाग किस तरह से प्रतिक्रिया देता है. उन्होंने पाया कि जब कोई खिलखिला कर हंसता है तब दिमाग केवल आवाज पर ध्यान देता है, लेकिन जब कोई मुस्कुराता है तब दिमाग दृष्यों पर भी ध्यान देने लगता है. दिमाग ऐसे संकेत देता है जिन से यह समझा जा सके कि मुस्कराहट प्यार से भरी है या उसमें अपमान का भाव छिपा है.

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि दिमाग के ऐसे राज समझ कर भविष्य में मनोरोग चिकित्सा में मदद मिल सकेगी. खास तौर से विषाद और व्यग्रता के शिकार लोगों और स्किजोफ्रीनिया के मरीजों में 'नॉन वर्बल कम्यूनिकेशन' को समझने की क्षमता काफी कम होती है. वैज्ञानिक अब समझना चाहते हैं कि इन मरीजों के दिमाग पर मुस्कराहट या हंसी देख कर कैसा असर पड़ता है. वे उम्मीद कर रहे हैं कि दिमाग के जिस हिस्से पर मुस्कराहट का असर पड़ता है उसके बारे में पूरी जानकारी निकाल लेने से इन बीमारियों के इलाज में आसानी होगी.

रिपोर्टः ईशा भाटिया (डीपीए)

संपादनः आभा मोंढे

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