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मनोरंजन

मजबूत बनीं हैं बिपाशा

हिंदी फिल्मों की जानी-मानी अभिनेत्री बिपाशा बसु ने अपने करियर में बुरा दौर देखा है. लेकिन वह इससे और मजबूत बन कर उभरी हैं. बिपाशा ने अतीत में अपनी गलतियों से भी सबक लिया है.

अभिनेता जॉन अब्राहम से अपना लंबा रिश्ता टूटने के बावजूद उनके मन में इंसानी रिश्तों को लेकर कोई तल्खी नहीं है. पिछले दिनों कोलकाता आई इस अभिनेत्री ने डॉयचे वेले के कुछ सवालों के जवाब दिए. पेश हैं उसके मुख्य अंश.

आपने पिछले कुछ वर्षों के दौरान खुद को अलग-थलग कर लिया था. क्या इससे करियर पर कोई असर पड़ा?

यह सही है. हर आदमी के जीवन में बुरा दौर आता है. बीच में मेरी प्राथमिकताएं बदल गई थीं और अभिनय प्राथमिकता सूची में नीचे चला गया था. मैंने दो वर्षों तक अपने करियर और पेशे की अनदेखी की. लेकिन अब मैं उस दौर से बाहर आ चुकी हूं. पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत होकर. मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि उस दौर के बावजूद मुझे मौके मिलते रहे. मैंने अतीत में की गई गलतियों से काफी कुछ सीखा है.

जॉन से अलगाव का आपके जीवन और करियर पर कितना असर पड़ा?

वह एक दुखद अनुभव रहा. उसने मुझे इंसानी रिश्तों पर नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया. रिश्तों का टूटना लोगों को कई नए अनुभव सिखाता है. मेरी राय में इससे इंसान और परिपक्व होकर उभरता है. आप जीवन के मूल्यों को गहराई से समझने लगते हैं.

क्या इससे आपके दिल में रिश्तों के प्रति बेरुखी पैदा हुई है?

ऐसा बिल्कुल नहीं है. मैं उस दौर से बाहर आ चुकी हूं. उस अनुभव ने मुझे सिखाया है कि आखिर मुझे कैसे इंसान का साथ चाहिए. अब मैं व्यवहारिक हो गई हूं.

आपकी निगाहों में आदर्श इंसान की क्या परिभाषा है?

जो औरतों को उसके गुण-अवगुण के साथ अपनाए और उसको अपना स्पेस बनाने दे. पुरुष ऐसा होना चाहिए जिसे मेरे साथ पर गर्व हो और जिसमें आत्मविश्वास की भावना कूट-कूट कर भरी हो. वह मेरी तरह ही कामयाब हो.

क्या अब तक कोई ऐसा इंसान मिला है?

वैसे, मीडिया समय-समय पर कई लोगों से मेरा नाम जोड़ता रहा है. लेकिन उनमें से ज्यादातर मेरे दोस्त हैं. हकीकत यह है कि मैं अभी सिंगल हूं. जिस दिन कोई मिल गया, सबको बता दूंगी.

अपने लंबे करियर में पीछे मुड़ कर देखने पर कैसा महसूस होता है?

मैंने अपने करियर में लगभग पांच दर्जन फिल्में की हैं और उनमें से कई फिल्में काफी खराब थीं. बाद में अफसोस भी हुआ. लेकिन उस समय पैसों और दूसरी वजहों से उन फिल्मों में काम करना मजबूरी थी. उन फिल्मों ने मुझमें अच्छे-बुरे को पहचानने की भावना पैदा की है.

क्या मन में कभी असुरक्षा की भावना पैदा होती है?

इंसान होने के नाते ऐसी भावना पैदा होना स्वाभाविक है. कभी कभी लगता है कि यह चीज ऐसे होने की बजाय वैसे होती तो ठीक होता. लेकिन हर चीज पर किसी का वश नहीं होता. कोशिश करना ही अपने हाथ में है. चीजें सही नहीं होने पर मैं सोचती हूं कि शायद मैंने मन से कोशिश ही नहीं की. यह सोच राहत देती है.

निकट भविष्य में घर बसाने का कोई इरादा?

इसके लिए पहले एक पुरुष की जरूरत होती है. फिर आपका मन पहले यह गवाही दे दे कि उसके साथ घर बसाना बेहतर है. जल्दबाजी में की गई शादियों को टूटते देख चुकी हूं. शादी के लिए समाज की ओर से काफी दबाव रहता है. इसलिए कई लोग हताशा में शादी करते हैं जो ज्यादा समय तक नहीं टिकतीं. इसलिए मैं कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहती. शादी के लिए प्यार ही एकमात्र वजह होनी चाहिए.

आपने अपने करियर में कभी किसी खान के साथ काम नहीं किया है. इसका कोई अफसोस?

उनके साथ कौन काम नहीं करना चाहता. मेरी भी दिली इच्छा है कम से कम किसी एक खान के साथ काम करने की. उनके साथ काम करना सफलता की गारंटी है. उम्मीद है कि भविष्य में कभी काम करने का मौका मिलेगा.

अभिनेत्रियों के प्रति हिंदी फिल्मोद्योग का नजरिया कितना बदला है ?

पहले के मुकाबले इसमें काफी बदलाव आया है. शादीशुदा हीरोइनों की बात तो छोड़ ही दें. पहले उस हीरोइन तक को ज्यादा काम नहीं मिलता था जिसका कोई ब्वायफ्रेंड होता था. हॉलीवुड में 40 से ऊपर वाली अभिनेत्रियों को स्टार माना जाता है. धीरे-धीरे ही सही, हिंदी फिल्मोद्योग भी बदल रहा है.

इंटरव्यू: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

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