1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

मजदूरों को निचोड़ता अमेजन

दुनिया की सबसे बड़ी शॉपिंग वेबसाइट अमेजन अपने कर्मचारियों के साथ बदसलूकी के मामले में फंस गया है. जर्मन चैनल ने अपनी डॉक्यूमेंट्री में कंपनी के खस्ताहाल व्यवस्था का राजफाश किया है.

अमेजन में काम करने वाले मजदूर अकसर अपनी फैक्ट्री से काफी दूर रहते हैं. एक घर में छह से लेकर सात लोग रहते हैं. क्रिसमस के समय पर खासकर पूरे यूरोप से सैकड़ों मजदूर जर्मनी काम करने आते हैं. अमेजन कंपनी की फैक्ट्री पहुंचने के बाद ही उन्हें कॉन्ट्रैक्ट मिलता है.

पहले तो उनसे कहा गया कि अमेजन उन्हें काम पर रखेगा. लेकिन कॉन्ट्रैक्ट उन्हें किसी और कंपनी से मिला, इसकी वजह से उनकी तनख्वाह काट ली गई. मजदूरों को बिना छुट्टी लगातार 15 दिन काम करना होता है. इस दौरान सुरक्षाकर्मी लगातार उन पर निगरानी रखते हैं.

अमेजन का सिस्टम

कंपनी की सेवा इंटरनेट के जरिए पूरी दुनिया में फैली है. लोग किताबों से लेकर कपड़े, जूते, फर्नीचर और हर तरह की चीज ऑर्डर करते हैं, जिसकी डिलीवरी उन्हें घर पर मिलती है. अमेजन सेकंड हैंड चीजें भी बेचता है और दूसरी चीजों की कीमत भी बाजार से आम तौर पर कम होती है. इस वजह से बहुत से लोग अपना ऑर्डर अमेजन पर देते हैं.

नॉरबर्ट फाल्टिन अमेजन में काम की परिस्थितियों से वाकिफ हैं. वे कोब्लेंज में कंपनी की लॉजिस्टिक सेंटर में काम करते हैं और जर्मन मजदूर यूनियन वेर्डी के सदस्य हैं. वे कोब्लेंज में कर्मचारियों के लिए प्रवक्ता भी हैं और कहते हैं कि वह "पूरे 100 प्रतिशत" अमेजन के वफादार हैं.

फाल्टिन टीवी रिपोर्ट में परिस्थितियों के बारे में कहते हैं कि क्रिसमस के दौरान सारे कर्मचारियों की बहुत सारी शिकायतें आ रही हैं. उनका मानना है कि इसके लिए अमेजन का सिस्टम जिम्मेदार है और जर्मनी में कई फैक्ट्रियों में यह सिस्टम लागू होता है. लेकिन वे नहीं मानते कि अमेजन स्पेन और ग्रीस जैसे आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे देशों से आ रहे कर्मचारियों से बदसलूकी करता है. साथ ही, अमेजन के ग्राहक भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं माने जा सकते हैं.

ग्राहकों की नाराजगी

अमेजन जर्मनी की रिपोर्ट पढ़ने के बाद ग्राहकों ने सोशल मीडिया वेबसाइटों पर अपना गुस्सा जाहिर किया. इंटरनेट पर अमेजन को बॉयकॉट करने की मांग हो रही है और अमेजन की कड़ी निंदा को देखते हुए इंटरनेट में इसे "शिटस्टॉर्म" का नाम दिया गया है.

लेकिन सोशल मीडिया में प्रचार का काम कर रहे टापियो लिलर कहते हैं कि इंटरनेट पर ज्यादातर लोग जो इसके खिलाफ बोल रहे हैं, वे अमेजन के ग्राहक हैं और उन्हें लगता है कि वहां मजदूरों की बुरी हालत के लिए वे भी जिम्मेदार हैं, "मैं मानता हूं कि बहुत लोग इसी से संतोष कर लेंगें."

वह कहते हैं कि जब इस साल क्रिसमस के लिए तोहफे खरीदने होंगे तो लोग दोबारा अमेजन पर जाएंगे और जब पैकेट उनके घर आएगा तो खुश होंगे. वे अमेजन में मजदूरों की हालत को भुला चुके होंगे.

अमेजन करेगा जांच

कंपनी ने कहा है कि वह इन आरोपों की जांच करना चाहता है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सुरक्षा कर्मी नीयोनाजी गुंडों से संपर्क में थे. अमेजन का कहना है कि उसकी कंपनी में न तो धमकियों को बढ़ावा दिया जाता है और न ही कर्मचारियों से भेदभाव किया जाता है.

कम समय के लिए काम करे कर्मचारियों की शिकायतों के बारे में कंपनी कहती है कि शिकायतों को गंभीरता से लिया जाता है और जरूरत पड़े तो बेहतरी लाई जाती है. लेकिन फाल्टिन भी कहते हैं कि कर्मचारी का विदेशी होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता.

फाल्टिन भी मानते हैं कि अमेजन की तरफ से बयान एक अच्छी बात है लेकिन जर्मनी में कंपनी के मुख्यालय को भी सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए थी. अमेजन को कम से कम पता चल गया है कि उसकी फैक्ट्री में बदलाव की जरूरत है.

लेकिन सोशल मीडिया प्रचार कर रहे लिलर कहते हैं कि अमेजन के मुनाफे में इससे फर्क नहीं पड़ेगा. इससे पहले सालांदो कंपनी के खिलाफ भी शिकायतें आई थीं, लेकिन कंपनी अब खूब पैसे कमा रही है.

श्रम मंत्री का बयान

इस बीच जर्मन श्रम मंत्री उर्सुला फॉन डेयर लायन ने कहा है कि वह इन मजदूरों के बारे में और जानकारी चाहती हैं और जल्द से जल्द सारे तथ्यों से अवगत होना चाहती हैं.

जर्मनी खुद को मानवाधिकार का चैंपियन कहता है और भारत, बांग्लादेश जैसे एशियाई देशों से जब कभी बाल मजदूरी और काम के लिए सही पैसे नहीं मिलने की रिपोर्टें आती हैं, तो उन्हें बढ़ चढ़ कर मुद्दा बनाता है. अब उस पर खुद अपने ही देश में मजदूरों के अधिकारों के हनन का मामला आया है और इस मुद्दे पर उस पर तेजी से कार्रवाई का दबाव होगा.

फाल्टिन कहते हैं कि अगर कम समय के लिए काम कर रहे मजदूरों को भी आम कर्मचारियों की तरह सामान्य कॉन्ट्रैक्ट मिले, तो स्थिति सुधर सकती है. वह कहते हैं कि क्रिसमस के वक्त और कर्मचारी तो चाहिए होते हैं लेकिन बाकी यूरोपीय देशों के कर्मचारियों को भी जर्मन नागरिकों जितने पैसे दिए जाने चाहिए. फाल्टिन का मानना है कि वेतन में इस तरह का फर्क जर्मन बाजार नीति की वजह से भी है.

रिपोर्टः जेनिफर फ्राजेक/एमजी

संपादनः अनवर जे अशरफ

DW.COM

WWW-Links

संबंधित सामग्री