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विज्ञान

मंदिर के फूल मालाओं से अब जैविक खाद

काशी के मंदिरों में प्रतिदिन चढ़ाई जाने वाली हजारों किलो फूल मालाएं अब गंगा में प्रदूषण का कारण नहीं बन रही हैं. भागीरथ सेवार्चन समिति ने मंदिरों के निर्माल्य से जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया शुरु कर दी है.

इस प्रक्रिया के तहत काशी के मंदिरों के निर्माल्य विर्सजित करने से रोकने और इस निर्माल्य को एकत्रित करने का काम समिति ने शहर के बाहर स्थित राजा तालाब के मेहदीगंज स्थित अपने जैविक खाद उत्पादन केंद्र में शुरु कर दिया है. तैयार खाद लागत मूल्य पर किसानों को उपलब्ध कराई जा रही है.

एक किलो खाद बनाने में समिति को 11.50 रुपये की लागत आ रही है जबकि इसे 12 रुपये प्रतिकिलो की दर से किसानों को उपलब्ध कराया जा रहा है. समिति के संरक्षक व काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी के अनुसार नगर के सभी प्रमुख मंदिरों से निर्माल्य इकट्ठा कर उससे जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया शुरु की गई है.

उन्होंने बताया कि केंद्र में 63 टैंको में गोबर, माला, फूल, धतूरा और नीम की खली डालकर छोड़ उसे दिया जाता है. 60 दिनों के बाद खाद तैयार होने पर उसे 10 दिन तक सुखाया जाता है.

इस कोशिश से न केवल मंदिरों का निर्माल्य साफ हो रहा है, बल्कि गंगा भी साफ सुथरी रहेगी. अगर भारत के सभी मंदिरों में ये काम शुरू कर दिया जाए तो न केवल मंदिरों की सफाई हो सकेगी, बल्कि आस पास की छोटी नदियों या नालियां जाम नहीं होंगी. इतना ही नहीं पुराने फूलों के कारण होने वाले मच्छर भी नहीं होंगे.

जैविक खाद उत्पादन केंद्र के डॉ संजय गर्ग जैविक खाद को किसानों में लोकप्रिय कराने की कोशिश कर रहे हैं. उनका कहना है कि इसकी मदद से पैदा होने वाले फसल से शरीर स्वस्थ रहता है. वहीं संस्था के सचिव कैलाशनाथ बाजपेयी ने बताया कि गंगा को बचाने के लिए संस्था लोगों के बीच जागरूकता अभियान चलाएगी.

एएम/आईबी (वार्ता)

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