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मंथन

मंथन 167 में खास

तेज रफ्तार तकनीक के दौर में नई नस्ल पीछे ना रहे, इसीलिए बर्लिन की एक प्रोफेसर बच्चों के लिए प्रोग्रामिंग के खास कोर्स पर काम कर रही हैं. और क्या है खास मंथन के इस अंक में, जानिए.

फेसबुक, व्हॉट्सऐप और वाइबर जैसे मेसेजिंग ऐप्स के आ जाने से अब आप दुनिया में कहीं भी अपने दोस्तों और परिवार से जुड़े रह सकते हैं. किसी जमाने में विदेश में चिट्ठी भेजना भी खूब महंगा पड़ता था. लेकिन अब मैसेज पड़ोस में ही किसी को भेजना हो या सात समंदर पार, एक ही बात है. और सिर्फ टेक्स्ट ही नहीं, इंटरनेट के जरिये आप वॉयस कॉल कर सकते हैं, वीडियो चैट भी कर सकते हैं. यहां तक कि शॉपिंग भी.

बच्चे सीखेंगे प्रोग्रामिंग

तकनीक इतनी तेजी से बढ़ रही है कि शुरू से ही बच्चों को इसके लिए तैयार करना जरूरी है. एशियाई देशों के मुकाबले यूरोप और खास कर जर्मनी इंटरनेट की दुनिया में अभी काफी पीछे है. बर्लिन यूनिवर्सिटी की एक प्रोफेसर इसे बदलना चाहती हैं और स्कूली बच्चों को प्रोग्रामिंग सिखाने की कोशिश कर रही हैं.

खुद चुनें करियर

डिजिटल तकनीक में ना सही, लेकिन मशीनों में जर्मनी की महारत है, फिर वो भले ही कारों में लगने वाली मशीनें हों या फिर प्लैनेटेरियम में. कई बार कंपनियां बच्चों को अपने यहां बुलाती हैं ताकि वो देख सकें कि कारखानों में काम कैसे होता है और वो आगे चल कर खुद को अपने करियर के लिए तैयार कर सकें.

बिल्डिंग में उगेंगे पेड़

मुंबई और गुड़गांव जैसे शहरों में 15-20 मंज़िला इमारतें कोई अनोखी बात नहीं. इन ऊंची ऊंची इमारतों में रहने वाले हरियाली से महरूम रह जाते हैं. तो क्यों ना बिल्डिंग में ही पेड़ उगा लिए जाएं? जी हां, ऐसा मुमकिन है. इटली में एक पेड़ों वाली बिल्डिंग मौजूद है. ना केवल पर्यावरण के लिहाज से यह एक फायदेमंद कॉन्सेप्ट है, बल्कि हमारी खुशहाली के लिए भी क्योंकि वैज्ञानिक इस बात को साबित कर चुके हैं कि हरा रंग देखने से हम इंसान अच्छा महसूस करते हैं.

साथ ही मंथन में बात होगी एक खास कला प्रदर्शनी की भी. म्यूजियम में हमेशा बड़े बड़े कलाकरों की ही पेंटिंग्स क्यों लगती हैं? जिन लोगों की पेंटिंग लाखों करोड़ों में नहीं बिकती, क्या उनकी कला कला नहीं है? यही सोच कर जर्मनी के एक म्यूजियम ने नौसिखियों की कला की एक्जिबिशन लगाई.

देखना ना भूलें मंथन हर शनिवार सुबह 11 बजे डीडी नेशनल पर.

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