मंथन में दिल की बात | विज्ञान | DW | 14.06.2013
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

विज्ञान

मंथन में दिल की बात

मंथन में इस बार कपड़े करवाएंगे कसरत, जानेंगे कैसे स्मार्ट टेक्सटाइल सेहत के लिए मददगार साबित हो सकते हैं. साथ ही होगी नजर सूखे में भी उगने वाली फसल पर. पता करेंगे कैसे वैज्ञानिक जौ की नई किस्में तैयार कर रहे हैं.

मंथन में इस बार आपके स्वास्थ्य पर खास ध्यान दिया जा रहा है. ऐसे कपड़ों की बात हो रही है जो आपको कसरत करना सिखाएंगे. ये कपड़े खास तौर से उन लोगों की मदद कर सकते हैं, जिनके जोड़ों में तकलीफ है. भारत में ही हर साल घुटनों और कूल्हों के करीब डेढ़ लाख ऑपरेशन होते हैं. मंथन में जानेंगे कि जर्मनी में नए जमाने के इम्प्लांट किस तरह तैयार किए जा रहे हैं. फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट फॉर लेजर टेकनीक आखेन में कूल्हे के इम्प्लांट के लिए लेजर की मदद से एक थ्री डी मॉडल बनाया जाता है. कृत्रिम अंग एक मिलीमीटर के दसवें हिस्से जितनी बारीकी से ठीक बैठना चाहिए. पेंच को न हिलना चाहिए और न ही रगड़ खानी चाहिए.

शाकाहारी कबाब

सेहत के लिए खाने पीने पर ध्यान देना भी जरूरी है. पहले की तुलना में लोग मांस ज्यादा खा रहे हैं. अकेले जर्मनी में ही एक व्यक्ति साल भर में करीब 90 किलो मांस खा जाता है. अगर शाकाहारी खाने को ही कुछ ऐसा रूप मिल जाए कि वह कबाब जैसा जायका दे सके, तो शायद जानवरों को मारने की जरूरत ही नहीं बचेगी और हम मौसम की मार से भी बच सकेंगे.

Wienerschnitzel

मटर या सोयाबीन से बनते हैं शाकाहारी कबाब

बवेरिया में पौधों से कटलेट बनाने की कोशिश की जा रही है. मिक्सर से पानी में गेहूं मिलाया जाता है. इसमें मटर या सोयाबीन भी डाला जाता है. मांस जैसे स्वाद के लिए गेहूं के छिलके का इस्तेमाल किया जा रहा है.

शिक्षा का प्रसार

इसके अलावा बात होगी शिक्षा के प्रसार की. ज्यादातर देशों में शिक्षा का अधिकार है लेकिन हर बच्चे तक यह नहीं पहुंचता. भारत, ग्वाटेमाला और घाना दुनिया के कुछ ऐसे देश हैं जो शिक्षा के प्रसार की ओर तेजी से काम कर रहे हैं. घाना में तो सरकार ने 17,000 प्राइमरी स्कूल बनवाए हैं. अफ्रीका के कई देशों में कुल मिलाकर इतने स्कूल नहीं हैं. सरकार को उम्मीद है कि 2015 तक हर बच्चा स्कूल जाने लगेगा. सरकारी स्कूलों में बच्चों को दोपहर का खाना और स्कूल की ड्रेस मुहैया कराने के साथ साथ, इस पश्चिमी अफ्रीकी देश में बच्चों तक ई-बुक रीडर पहुंचाने की भी मुहिम चलाई जा रही है. एक ई-बुक रीडर की कीमत 100 यूरो यानी करीब 7,000 रुपये है. अफ्रीका के अलावा भारत और जर्मनी में किस तरह से शिक्षा का प्रसार किया जा रहा है, ये सारी जानकारी आपको मिलेगी मंथन के इस अंक में. साथ ही होंगी और भी कई रोमांचक रिपोर्टें शनिवार सुबह 10.30 बजे डीडी-1 पर.

रिपोर्ट: ईशा भाटिया

संपादन: आभा मोंढे

DW.COM

WWW-Links

संबंधित सामग्री