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दुनिया

भोपाल त्रासदीः दर्द और रंज के 26 साल

26 साल बीत गए. लेकिन कुछ नहीं बदला. दर्द, रंज और जंग सब कुछ ज्यों का त्यों है. कुछ चेहरों पर झुर्रियां पड़ गई हैं. कुछ बच्चों के कद निकल आए. लेकिन इन 26 साल में जिया कोई नहीं.

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इंसाफ की जंग

सदी की सबसे बड़ी त्रासदी भोपाल गैस कांड को 26वीं बार रोया जा रहा है. उसका मातम अब इस रंज के साथ मनाया जाता है कि किसी ने पीड़ितों के लिए कुछ नहीं किया. जो उस वक्त इस हादसे के असर झेल रहे थे वे आज भी झेल रहे हैं. और वे भी, जिन्होंने उस हादसे को देखा तक नहीं. जैसे सात साल की वह बच्ची जो हादसे के सालों बाद पैदा हुई. उस बच्ची के मां बाप के हौसले की दाद देनी चाहिए. उन्होंने बेटी का नाम खुशी रखा. जब खुशी पैदा हुई तभी से उसके कई अंग बेकार थे. वह न चल पाती है न हाथ से ही कोई काम कर पाती है. लेकिन उसका नाम खुशी है क्योंकि उसके मां बाप के संघर्ष में वह उम्मीद की किरण है.

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खुशी की मां तूलिका वर्मा रोज उसे एक एनजीओ चिंगारी के पुनर्स्थापन केंद्र पर लाती हैं. वह बताती हैं, “खुशी की याददाश्त बहुत तेज है. वह कंप्यूटर्स में बहुत अच्छी है.” केंद्र में विशेष शिक्षक के तौर पर काम करने वाले तारिक अहमद बताते हैं कि खुशी के पापा संजय वर्मा भोपाल हादसे के उन लाखों पीड़ितों में से हैं जो गैस लीक होने के बाद ताउम्र के लिए अपाहिज हो गए. अहमद ने बताया कि वर्मा को मुआवजा मिलता है.

खुशी को कंप्यूटर पर काम करते देख वर्मा परिवार को उसका नाम सार्थक होता लगता है. लेकिन मथुरा प्रसाद रायकवाड़ इतने किस्मतवाले नहीं हैं. उनका 10 साल का बेटा देवेश जहरीली गैस के प्रभाव के कारण मानसिक रूप से विकलांग पैदा हुआ. फिर भी, रायकवाड़ ने हिम्मत नहीं हारी है. वह देवेश को लेकर रोज सेंटर आते हैं. अहमद बताते हैं कि देवेश कविताएं याद करने की कोशिश करता है लेकिन भूल जाता है. पर रायकवाड़ 1 और 2 दिसंबर की उस भयानक रात को नहीं भूल पाते जिसका अंधेरा उनकी जिंदगी पर आज भी कायम है.

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15 हजार से ज्यादा लोगों की जान लेने वाला यह हादसा आज भी कायम है क्योंकि किसी अपराधी को सजा नहीं हुई. हर बार की तरह इस बार भी पीड़ितों ने सड़कों पर प्रदर्शन किये हैं. वे आज भी इस बड़े हादसे से लड़ रहे हैं. लेकिन सच यह है कि उनकी निजी जिंदगियों में जो छोटे छोटे हादसे उग आए हैं, उनसे लड़ना ज्यादा मुश्किल है.

रिपोर्टः एजेंसियां/वी कुमार

संपादनः ए कुमार

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