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विज्ञान

भूल से भारत पहुंची खूबसूरत तितली

नाजुक, कोमल और रंग बिरंगी तितली क्या पानी के जहाज के जरिए हजारों किलोमीटर का सफर कर सकती है. इस लंबे सफर के बाद क्या वो रेल और ट्रक में सवार होकर हिमालय पहुंच सकती है. हां, हिमालय तक एक तितली ऐसे ही पहुंची है.

भारत के हिमालयी इलाके में मिलने वाली एक खूबसूरत तितली ने वैज्ञानिकों को हैरान किया है. शोध में बता चला है कि तितली मूल रूप से अमेरिका की है. 1950 के दशक में अनाज के जहाज के साथ यह भारत आई. मुंबई या कोलकाता के बंदरगाह में उतरने के बाद ट्रेन या ट्रक के जरिए यह उत्तर भारत की तरफ बढ़ी और आखिर में हिमालय तक पहुंच गई. बाथ व्हाइट बटरफ्लाई कही जाने वाली यह तितली अब उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में बड़ी संख्या में मिलती है.

तितली विशेषज्ञ पीटर स्मेटसेक ने जीव जंतुओं के एक जगह से दूसरी जगह बसने पर एक किताब लिखी है. बटरफ्लाईज ऑन दी रुफ ऑफ द वर्ल्ड नाम की किताब में उन्होंने बाथ व्हाइट बटरफ्लाई का जिक्र किया है. तितली के अमेरिका से भारत तक के सफर का अंदाजा लगाते हुए स्मेटसेक कहते हैं, "1950 के दशक में गेहूं के एक जहाज के साथ गलती से यह घास अमेरिका से भारत आई. यहां आकर यह तेजी से फैल गई" खर पतवार में तितली के अंडे भी थे.

Fotowettbewerb Schmetterling und Frühling

दुनिया में तितली की 18,000 से ज्यादा प्रजातियां हैं.

तितली विशेषज्ञ ने तितली के लार्वा और कुछ पौधों के बीच के रहस्यमय रिश्ते पर भी रोशनी डाली है. "एक बार मैं लॉन में किसी मेहमान से बात कर रहा था, तभी मैंने देखा कि मादा तितली ने कुछ ही मीटर दूर घास फूस पर अंडे दिए. मैंने उस घास फूस को जमा कर लिया और देखा कि अंडों से लार्वा निकल पड़ा."

भारत में पहली बार यह तितली 21 अप्रैल 1961 को नैनीताल जिले के भीमताल शहर में दिखाई पड़ी. धीरे धीरे झील से घिरे शहर भीमताल में ही बस गई. स्मेटसेक ने भारत और नेपाल में पाई जाने वाली तितलियों की सैकड़ों प्रजातियों का अध्ययन किया है. उनके मुताबिक तितलियों के पनपने के लिए जरूरी है कि उनका आहार बनने वाले पौधे फैलें. स्मेटसेक का मानना है कि ब्रिटिश हूकूमत के साथ 20वीं सदी में भारत में बड़ी संख्या में यूरोपीय पौधे आए. हिमालय के ठंडे इलाकों में इन्हें आदर्श माहौल मिला, पौधे जम गए और रंग बिरंगी तितलियों को भी बसेरा मिल गया.

ओएसजे/एनआर (पीटीआई)

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