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ब्लॉग

भुल्लर और भारतीय कानून

याद कीजिये 11 सितंबर 1993 का दिन, जब दिल्ली का दिल कहे जाने वाले लुटियन जोन में 40 किलोग्राम आरडीएक्स से भरी कार में भीषण विस्फोट की धमक से राष्ट्रपति भवन तक हिल गया. धमाके में नौ निर्दोष परिवारों की खुशियां भेंट चढ़ गई.

इसी विस्फोट में घायल युवा नेता एमएस बिट्टा सहित 25 दूसरे लोग आज भी सामान्य जिंदगी नहीं जी पा रहे हैं. हमले की भयावहता और उसके परिणाम तो अलग. अब बात कानूनी प्रक्रिया और उसके हश्र की है.

आतंकवाद से जुड़े इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दूरगामी और बहुआयामी प्रभाव हैं. इसलिए इस फैसले की अहमियत को समझने के लिए इससे जुड़े घटनाक्रम को भी जानना जरूरी है. इस विस्फोट के मुख्य आरोपी देवेन्द्र पाल सिंह भुल्लर के खिलाफ 1993 में मुकदमा शुरू होने के आठ साल बाद 25 अगस्त 2001 को निचली अदालत ने भुल्लर को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुना दी. इतना ही नहीं सिर्फ सात महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने 26 मार्च 2002 को भुल्लर की अपील खारिज कर उसकी सजा को बरकरार रखा और तो और इसके नौ महीने बाद 17 दिसम्बर 2002 को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी. ऐसे में भुल्लर अदालती कार्यवाही में देरी का आरोप नहीं लगा सकता और उसने ऐसा किया भी नहीं.

यह बात सही है कि 14 जनवरी 2003 को राष्ट्रपति के सामने आई उसकी दया याचिका के निपटारे में मुकदमे के बराबर ही वक्त लग गया और 25 मार्च 2011 को राष्ट्रपति से भी भुल्लर को राहत नहीं मिली. उसने इसी देरी को आधार बना कर सुप्रीम कोर्ट में दया की गुहार लगाई और एक साल के भीतर अदालत ने सुनवाई पूरी कर 19 अप्रैल 2012 को फैसला सुरक्षित कर लिया. लगभग एक साल से सुरक्षित रखे गए फैसले को अदालत ने 12 अप्रैल 2013 को सुनाते हुए भुल्लर की आखिरी अपील को भी खारिज कर दिया.

अब सवाल उठाना लाजिमी है कि आखिर एक साल तक कोर्ट ने फैसले को सुरक्षित क्यों रखा? फैसले का मजमून इस सवाल का जवाब बखूबी देता है. इसमें साफ तौर पर कहा गया है कि याचिकाकर्ता दोषी है, इसमें उसे स्वयं और किसी अन्य को भी कोई शक नहीं है. वह तो सिर्फ स्वयं के लिए दया की गुहार लगा रहा है. अदालत ने कहा कि यह सवाल मौजूं है कि दया का हकदार आखिर कौन है?

काबिले गौर बात है कि निचली अदालत से लेकर राष्ट्रपति तक, हर जगह उसके मामले में जर्मन सरकार के 1995 के उस फैसले का हवाला दिया गया जिसमें उसे राजनीतिक शरण देने की मांग को खारिज किया गया था. भुल्लर ने 1994 में जर्मन सरकार से खुद को राजनितिक विचारक बताते हुए शरण की मांग की थी. लेकिन 11 सितंबर 1993 के मंजर को मद्देनजर रखते हुए जर्मन सरकार ने भुल्लर को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार चार्टर की धारा 14 के तहत राजनीतिक शरणार्थी का दर्जा पाने का हकदार नहीं माना.

लगभग यही बात सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने हालिया फैसले में कही है कि कोई भी विचारवान व्यक्ति नफरत की आग में जल कर इतने भीषण कांड को अंजाम नहीं दे सकता. साथ ही ऐसा इन्सान अपने लिए दया की मांग करने का हकदार नहीं माना जा सकता जो स्वयं को राजनीतिक चिंतक भी बताता है और निर्दोष लोगों के प्रति दया का कोई भाव न रखता हो.

राष्ट्रपति के यहां हुई देरी के बारे में भी कोर्ट ने फैसले में स्पष्ट किया है कि भुल्लर की ओर से काफी अधिक लोगों ने उसके लिए विभिन्न आधारों पर दया की अर्जी लगा दी, जिन पर विचार किए जाने के कारण इतना अधिक समय लग गया. जहां तक एक साल तक फैसला सुरक्षित रखने का सवाल है, उसके पीछे भी अदालत का मानवीय पहलू झलकता है. अदालत इस बात से बाखबर थी कि साल 2011 में राष्ट्रपति से दया याचिका ठुकराए जाने के बाद से ही भुल्लर का मानसिक संतुलन ठीक नहीं था.

अवसाद की गिरफ्त में भुल्लर का बतौर मानसिक रोगी दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड अलाइड साइंस (इबहास) में लगभग ढाई साल से इलाज चल रहा है. कोर्ट नहीं चाहता था कि मौत के भय से लगातार गंभीर मानसिक रोगी होते जा रहे भुल्लर को आखिरी अपील ठुकराए जाने की बात से और धक्का लगे. भुल्लर को अवसाद से उबारने के लिए लगातार काउंसिलिंग का दौर जारी है. अस्पताल की रिपोर्टों के मुताबिक हाल ही में उसकी हालत कुछ बेहतर होने पर ही कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है. ऐसे में अदालत ने साफ कर दिया है कि भुल्लर के साथ कानून के दायरे में रहकर उसके हक के मुताबिक ही दया बरती गई है. इस फैसले में कोर्ट ने एक और संदेश देते हुए लिखा है कि दया की उम्मीद करने वाले लोग आखिर हैं कौन, जिन्होंने अपराध करते समय दया का किंचित मात्र भाव भी प्रकट नहीं किया. इशारा, आतंक का घिनौना खेल खेलने वालों की ओर है, चाहे वे देश के भीतर पनपे हों या बाहर से आये हों.

भारतीय कानून के मुताबिक दो स्थितियों में फांसी नहीं दी जा सकती. एक गर्भवती महिला को और दूसरा मानसिक अथवा अन्य गंभीर रोगी को. भुल्लर अभी इबहास में भर्ती है और संस्थान के निदेशक डॉक्टर एनजी देसाई का कहना है उसकी काउंसिलिंग चल रही है. साथ ही बीच बीच में उसे बिजली का झटका भी देना पड़ता है. जबकि तिहाड़ जेल के प्रवक्ता सुनील गुप्ता ने फांसी के नियमों का हवाला देकर साफ कर दिया है कि जब तक इबहास की और से भुल्लर को फिट घोषित नहीं कर दिया जाता तब तक उसे सजा देने का सवाल ही नहीं उठता.

डॉक्टर देसाई के मुताबिक मानसिक रोगी के दुरुस्त होने की कोई मियाद नहीं होती. कानून ने अपना काम पूरा कर दिया है. अब भुल्लर की जिंदगी पूरी तरह से नियति के हाथों में है.

ब्लॉगः निर्मल यादव

संपादनः अनवर जे अशरफ