′भुलक्कड़पन′ दूर करने की ठानी जी8 ने | विज्ञान | DW | 12.12.2013
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विज्ञान

'भुलक्कड़पन' दूर करने की ठानी जी8 ने

जी-आठ देशों ने 2025 तक डिमेंशिया यानि भूलने की बीमारी का उपचार ढ़ूंढने या फिर अभी प्रचलित तरीकों को बेहतर बनने के लिए साथ मिल कर काम करने का फैसला लिया है. डिमेंशिया के इलाज पर आज भी बहुत कम शोध हो रहा है.

लंदन में संपन्न हुए स्वास्थ्य मंत्रियों और विशेषज्ञों के एक सम्मेलन के बाद ब्रिटेन के स्वास्थ्य सचिव जेरेमी हंट ने बताया कि डिमेंशिया के खिलाफ इस मुहिम में एक विशेष दूत भी नियुक्त किया जाएगा. ये दूत ना सिर्फ दुनिया भर से डिमेंशिया पर किए जा रहे सर्वश्रेष्ठ अनुसंधान और इसमें दक्ष लोगों को साथ लाएगा बल्कि इस पर चल रहे शोध के लिए सरकारों के साथ साथ निजी कंपनियों से धनराशि भी इकट्ठा करेगा. ब्रिटेन के स्वास्थ्य सचिव जेरेमी हंट के मुताबिक, "अभी इस अनुसंधान में बहुत कम राशि लग रही है. ये एक बहुत महत्वाकांक्षी योजना है जिसमें अगर हम तारों तक पहुंचने की कोशिश नहीं करते हैं तो चांद तक भी नहीं पहुंच सकेंगे."

हर चार सेकेंड में नया मरीज

डिमेंशिया की स्थिति में रोगी की पहचानने की क्षमता कम हो जाती है जिसे आम तौर पर अल्जाइमर्स नाम की बीमारी के रूप में देखा जाता है. दुनिया भर में डिमेंशिया से पीड़ित लोगों की संख्या करीब चार करोड़ है. विश्व स्वास्थ्य संगठन, डबल्यूएचओ की मानें तो ये संख्या हर दो दशक में करीब दोगुनी होने वाली है. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने सम्मेलन में कहा कि हर चार सेकेंड में डिमेंशिया का एक नया मामला सामने आ रहा है. कैमरन ने कहा, "कई साल पहले, मलेरिया, कैंसर, एचआईवी और एड्स का मुकाबला करने के लिए पूरा विश्व एक साथ आया था और आज फिर हम डिमेंशिया के खिलाफ एकजुट हुए हैं."

इसी दृढ़ निश्चय के साथ जी-आठ समूह ने शोध की धनराशि में "उल्लेखनीय" वृद्धि करने और सूचना एवं अनुसंधान के आसानी से आदान प्रदान पर आपसी सहमति बना ली है. इस समूह ने डबल्यूएचओ से आह्वान करते हुए कहा है कि वे डिमेंशिया को "विश्व स्वास्थ्य के लिए बढ़ते खतरे" के रूप में मान्यता दें. साथ ही जी-आठ ने समाज में इस बीमारी से पीड़ित लोगों के प्रति भेदभाव को कम करने के प्रयास और तेज करने की अपील की है.

Symbolbild Mann denkt nach

हर पल बढ़ती मरीजों की संख्या

सब दवाएं फेल

अल्जाइमर्स के इलाज के लिए जो अंतिम दवा कारगर मानी गई थी उसे करीब दस साल हो गए हैं और आज तक ऐसा कोई उपचार नहीं ढ़ूंढा जा सका है जिससे बीमारी के बढ़ने को किसी तरह रोका जा सके. अभी मौजूद दवाएं सिर्फ बीमारी के कुछ लक्षणों पर काबू पाने का काम करती हैं.

अमेरिका की फार्मासूटिकल रिसर्च एवं मैनुफैक्चरर्स नामक संस्था के मुताबिक पिछले 15 साल में 100 से भी ज्यादा ऐसी दवाएं शोध के दौरान बीमारी को रोकने में असफल पाई गई हैं. फिर भी बहुत सी बड़ी दवा कंपनियां दुनिया भर में इसकी मांग को देखते हुए सही इलाज खोजने में लगी हुई हैं जिसे बेचकर ये कई करोड़ का कारोबार कर सकेंगी. अमेरिका की मर्क एंड कंपनी, एली लिलि, रोशे और जॉनसन एंड जॉनसन भी इसकी दवाएं बनाने की कोशिश कर रही हैं.

बेहद महंगी बीमारी

ब्रिटेन की सबसे बड़ी चैरिटबल ट्रस्टों जैसे डिमेंशिया चैरिटी, अल्जाइमर्स सोसायटी ने भी डिमेंशिया पर शोध के लिए आने वाले दस सालों में 10 करोड़ पाउंड खर्च करने का प्रण लिया है. ब्रिटेन ने एक और घोषणा में बताया कि दवा कंपनी ग्लैक्सो स्मिथ क्लाइन भी देश में 20 करोड़ पाउंड स्वास्थ्य संबंधी शोध पर खर्च करेगी.

डबल्यूएचओ के आंकड़े बताते हैं कि हर साल इस बीमारी की वजह से लगभग साठ हजार करोड़ डॉलर का नुकसान हो रहा है जो कि पूरे विश्व के सकल घरेलू उत्पाद का करीब एक प्रतिशत है. जी-आठ के सदस्य देशों अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, रूस और जापान के साथ आने से उम्मीद तो जगी है लेकिन अभी तो ये बीमारी पूरी दुनिया और रोगी के साथ साथ उनके परिवार को बहुत महंगी पड़ रही है.

आरआर/एए (डीपीए, रॉयटर्स)

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