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दुनिया

भुखमरी मिटाने में मनरेगा की कामयाबी

दस साल पुरानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना मनरेगा ने लाखों लोगों को गरीबी से निजात दिलाई है और उन्हें दो जून की रोटी मुहैया कराने में अहम भूमिका निभाई है. लेकिन अब भी इसमें सुधार की काफी गुंजाइश है.

सबसे बड़ी समस्या मनरेगा योजना में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोपों की है. राज्य सरकारों पर भी इस योजना के मद में मिली रकम को दूसरे मद में खर्च करने के आरोप लगे हैं. दिलचस्प बात यह है कि बीते साल इस योजना को कांग्रेस की विफलताओं का स्मारक बताने वाली केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार भी अब इसकी दसवीं वर्षगांठ मना कर इसकी कामयाबी का सेहरा अपने सिर पर बांधने का प्रयास कर रही है.

बदलती तस्वीर

पश्चिम बंगाल के जंगलमहल इलाके के नाम से बदनाम पश्चिम मेदिनीपुर जिले के लालगढ़ के सुमित महतो के परिवार के पास अपना कहने को दो गज जमीन भी नहीं है. किसी तरह जंगल की लकड़ियां काट कर या फिर दूसरे के खेतों में हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद आठ लोगों के इस परिवार में चूल्हा जलता था. वह भी हमेशा काम नहीं मिलने के कारण हफ्ते के सातों दिन संभव नहीं हो पाता था. लेकिन मनरेगा ने इस परिवार को भूखमरी से बाहर निकाल लिया है. महतो बताते हैं, "इस योजना के तहत सौ दिनों तक परिवार के चार सदस्यों को काम मिलने की वजह से पूरे साल का खर्च निकलने लगा. पहले जहां हफ्ते में दो-एक न भूखे रहने की नौबत थी वहीं अब रोजाना कम से कम पेट की आग तो बुझ ही जाती है, भविष्य के लिए भी दो पैसे बच जाते हैं."

पडोस के बांकुड़ा जिले के रामधर महतो के परिवार की कहानी भी इससे मिलती-जुलती है. माओवादी गतिविधियों के चलते इलाके में पहले रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं थी. लेकिन इलाके में मनरेगा ने जब से गति पकड़ी है, महतो की तरह हजारों परिवार का जीवन कुछ हद तक आसान हो गया है. हालांकि इसमें भी तय समय पर मजदूरी नहीं मिलने और सौ दिन काम नहीं मिलने की शिकायतें मिलती रहती हैं. लेकिन पहले के मुकाबले हालात बेहतर हुए हैं. इस योजना के तहत गांवों में कुएं और तालाब खोदे गए हैं, सड़कें बन गई हैं और साथ ही आम के आम गुठली के दाम की तर्ज पर इस काम के पैसे भी मिले हैं. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दावा करती रही हैं कि मनरेगा में बंगाल पूरे देश में अव्वल है.

राजनीति का मुद्दा

वैसे, यह योजना भी राजनीति से अछूती नहीं रही है. विपक्ष में रहते हुए बीजेपी ने शुरू से ही इस पर सवाल उठाते हुए इसमें भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोप उठाए थे. सत्ता में आने के बाद बीते साल भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में इसे कांग्रेस की विफलताओं का स्मारक बताया था. लेकिन उस बात को साल बीतते न बीतते इस योजना के प्रति मोदी सरकार का नजरिया पूरी तरह बदल गया है. दिल्ली में इस योजना के दस साल पूरे होने के मौके पर आयोजित एक समारोह में कई लोगों को सम्मानित भी किया गया है. वित्त मंत्री अरुण जेटली कहते हैं, "मोदी सरकार ने मनरेगा योजना को न सिर्फ आगे बढ़ाया है बल्कि इस मद में रकम भी बढ़ाई गई है."

दूसरी ओर, इस योजना की दसवीं सालगिरह पर आंध्र प्रदेश के अनंतपुर पहुंचे कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर हमला किया. उन्होंने कहा कि जिस सरकार ने कुछ महीने पहले ही इसे विफलताओं का स्मारक करार दिया था वही अब इसकी कामयाबी का सेहरा अपने सिर पर बांधने का प्रयास कर रही है. कांग्रेस का कहना है कि एनडीए सरकार को मनरेगा की अहमियत बहुत देर से समझ में आई है.

योजना पर सवाल

वैसे, इस योजना पर सवाल कम नहीं उठे हैं. खासकर यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के आखिरी दो वर्षों के दौरान तमाम विपक्ष, राजनीतिक पर्यवेक्षक और अर्थशास्त्री इसे पैसों की बर्बादी करार देते हुए आरोप लगा रहे थे कि इसने ग्रामीण इलाकों के गरीब लोगों को आलसी बना दिया है. लेकिन बीते दो वर्षों के दौरान कई राज्यों में लगातार सूखे की मार ने इस योजना को एक बार फिर प्रासंगिक बना दिया है. अब यह ग्रामीण इलाकों में गरीबी और रोजगार की चिंता दूर करने का सरकार का सबसे अहम हथियार बन गई है. यही वजह है कि अब मोदी सरकार यूपीए की नाकामी के इस कथित स्मारक को राष्ट्र का गौरव करार दे रही है.

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देहातों के लिए इंटरनेट

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के दबाव की वजह से ही सरकार को बीते साल के दौरान इस योजना के मद में ज्यादा रकम जारी करने को मजबूर होना पड़ा. नतीजतन इस योजना में पहले के मुकाबले ज्यादा कामयाबी दर्ज की गई है. सरकारी आंकड़ों से साफ है कि बीते साल इस योजना के जरिए जितने मानव श्रमदिवस का सृजन हुआ उनमें आधे से ज्यादा महज पांच राज्यों, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में ही हुआ था. जाहिर है देश के तमाम बाकी राज्यों में अब भी इस योजना को लागू करने में वांछित कामयाबी नहीं मिल सकी है.

बेहतर बनाने की चुनौती

तमाम कामयाबियों के बावजूद ग्रामीण इलाकों की तस्वीर बदलने में सक्षम इस योजना की चुनौतियां अब भी बरकरार हैं. मनरेगा के तहत लोगों को काम तो मिलने लगा है, लेकिन मजदूरी करने वाले हजारों लोगों को समय पर मजदूरी नहीं मिल रही है. भुगतान में देरी के अलावा न्यूनतम मजदूरी में कटौती, सौ दिन काम नहीं मिलने और भ्रष्टाचार के आरोप भी सामने आ रहे हैं. मनरेगा को और कामयाब बनाने के लिए इन समस्याओं पर अंकुश लगाना जरूरी है.
हालांकि ग्रामीण विकास मंत्रालय का दावा है कि 2015-16 में मनरेगा दोबारा पटरी पर लौटा है. पिछली दो-तिमाही में औसतन जितना रोजगार मिला, उतना पिछले पांच साल में नहीं हुआ था. यह आंकड़े ऐसे समय जारी किए गए हैं, जब मनरेगा पर सरकार की मंशा को लेकर विपक्षी राजनीतिक पार्टियां सवाल उठाने लगी हैं. इन आंकड़ों से यह भी साफ है कि ग्रामीण इलाकों में भूमिहीन गरीब लोगों की मनरेगा पर निर्भरता बढ़ती जा रही है. अब एक दशक बाद इस योजना की खामियों को पहचान कर उनको दूर करने पर ही इसका असली मकसद हासिल किया जा सकेगा.

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