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दुनिया

भिखारियों ने दिया दान

जिंदगी भर दूसरों से दान मांगने वाले भिखारियों का मन भी दान देने को करता है. पुणे के सरकारी रिसेप्शन सेंटर में रहने वाले 75 भिखारियों ने नेत्रदान की इच्छा व्यक्त जताई है.

पुणे के भिखारियों ने ऐसे दान की ठानी है जो दूसरों की जिंदगी में रौशनी ला दे. पुणे में लायंस क्लब और समाज कल्याण विभाग नेत्रदान को लेकर जागरूकता अभियान चला रहा है. इसी के तहत एक प्रेरक फिल्म इन भिखारियों को दिखाई गयी. नेत्रहीन लड़की पर आधारित करीब 20 मिनट की फिल्म देखकर ये भिखारी इतने प्रभावित हुए कि तुरंत ही उन्होंने इस नेत्रदान अभियान से स्वयं को जोड़ लिया. महिला एवं बाल विकास विभाग से संचालित इस रिसेप्शन सेंटर के वार्डन संजय दुधाकर बताते हैं कि इन भिखारियों में आमतौर पर जीवन को लेकर निराशा रहती है लेकिन इस फिल्म ने उनमें आशा और उत्साह का संचार किया है.
संजय दुधाकर के मुताबिक भिखारियों ने पूरे मन से नेत्रदान के प्रति अपनी सहमति दी है. इन पर कोई दबाव नहीं था. वे कहते हैं, "समाज को कुछ देने का भाव उनके उद्देश्य विहीन जीवन को एक लक्ष्य दे रहा है. भिखारी से अचानक दाता बने इन भिखारियों की खुशी और संतोष को उनके चेहरे पर पढ़ा जा सकता है.
जिला सामाजिक कल्याण अधिकारी संजय कदम ने डी डब्ल्यू से बातचीत में बताया कि नेत्रदान के प्रति भिखारियों ने जिस उत्साह का परिचय दिया वग उम्मीद से बढ़ कर है. उनका कहना है, "नेत्रदान के लिए शिक्षित और संपन्न लोगों को आश्वस्त करना काफी मुश्किल होता है, इसे देखते हुए हमें लगा था कि अशिक्षित और वंचित तबके को समझाने में और दिक्कत आ सकती है, लेकिन इन भिखारियों ने हमारी धारणा बदल दी.अब सड़कों और फुटपाथों पर रहने वाले भिखारियों को भी नेत्रदान अभियान से जोड़ने की कोशिश की जाएगी."


जिज्ञासु भिखारी
नेत्रदान को आगे आए भिखारी भी आम लोगों की ही तरह इस बारे में काफी कुछ जानना चाहते हैं. नेत्रदान की प्रक्रिया के बारे में जानने को लेकर ज्यदातर भिखारी बहुत इच्छुक थे. कुछ यह भी जानना चाहते थे कि मोतियाबिंद जैसी बीमारी के बावजूद क्या वे नेत्रदान कर सकते हैं? संजय दुधाकर के अनुसार उनके सेंटर में रहने वाले लगभग सभी भिखारी नेत्रदान के लिए पूरी तरह फिट हैं. मुंबई में भीख मांग कर अपना जीवन बिताने वाली लक्ष्मी कहतीं हैं कि उन्हें अंग दान या नेत्रदान के बारे में पता नहीं है. मंदिर के बाहर भक्तों की दया और दान पर अपनी जिंदगी जी रहीं लक्ष्मी कहती हैं, "मरने के बाद उनके अंग किसी के काम आ सके तो उन्हें ख़ुशी होगी."
महाराष्ट्र के यवतमाल जिले सुशीला मुंबई में भीख मांग कर 50-100 रूपये तक कमा लेती हैं. उनका कहना है कि भीख मांगना बहुत बुरा लगता है लेकिन जिंदा रहने के लिए यही एकमात्र सहारा है. लक्ष्मी की तरह सुशीला को भी नेत्रदान के बारे में कुछ पता नहीं लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं होंगी. कारण पूछने पर सुशीला का कहना था, " कहीं सहमति देने के बाद जिंदा रहते हुए ही उनकी आंखें निकाल न ली जाय."
व्यावहारिक दिक्कतें
राज्य के मुंबई, पुणे और नागपुर में भीख मांगने की अनुमति नहीं है. सार्वजानिक स्थानों पर भीख मांगने वालों पर कानूनी कार्यवाई होती है. संजय दुधाकर बताते हैं कि पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद ही, भिखारियों को उनके रिसेप्शन सेंटर में लाया जाता है. इन केन्द्रों में भिखारियों को तीन साल से ज्यादा नहीं रखा जा सकता. तीन साल बाद ये भिखारी कहां रहेंगे, किसके साथ रहेंगे यह तय नहीं है. यह कोई नहीं बता सकता कि मृत्यु के समय, जब नेत्रदान करना हो तो वे कहां मिलेंगे? संजय दुधाकर के अनुसार नेत्रदान के "समय इनको तलाशना मुश्किल होगा. ज्यदातर भिखारियों का अपना स्थाई घर नहीं है."
नेत्रदान अभियान से जुड़े इन भिखारियों की आंखों में दाता बनने की जो चमक है, वह स्थाई साबित हो सकती है, लेकिन इसके लिए सरकारी विभागों में बेहतर तालमेल की आवश्यकता है. अगर ऐसा हुआ तो ये भिखारी सचमुच किसी की जिंदगी में रोशनी भर सकेंगे.
रिपोर्ट: विश्वरत्न, मुंबई

संपादनः एन रंजन


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