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दुनिया

भारत से सहयोग चाहता है नेपाल

राजशाही के खात्मे के बाद लोकतंत्र को अपनाने की कोशिश करते नेपाल की मुश्किलें नहीं मिट रही, भारत के छोटे से पड़ोसी देश को दुनिया के बड़े लोकतंत्र से बड़ी मदद की उम्मीद है.

शेर बहादुर देऊबा तीन बार नेपाल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं और नेपाली कांग्रेस में उन्हें दूसरा सबसे बड़ा नेता माना जाता है. काठमांडू के त्रिभुवन विश्वविद्यालय से एम. ए. और एल.एल.बी. करने के बाद उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इक्नॉमिक्स में रिसर्च फेलो के रूप में शोध किया. देऊबा नेपाल-भारत मैत्री के प्रबल समर्थकों में से एक हैं और इन दिनों भारत आए हुए हैं. मंगलवार को विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने हैदराबाद हाउस में उनके सम्मान में दोपहर के भोज का आयोजन किया था. बुधवार की सुबह देहरादून के लिए रवाना होने से ठीक पहले नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देऊबा ने डीडब्ल्यू के कुलदीप कुमार से भेंट की. बातचीत के प्रमुख अंशः

सबसे पहले तो मैं आपसे यह पूछना चाहूंगा कि आपकी इस भारत यात्रा का उद्देश्य क्या है?

राजनीति की दृष्टि से नेपाल इस समय एक संक्रमण काल से गुजर रहा है. इस संक्रमण काल में राजनीतिक गतिविधियों में क्या प्रगति हुई है, मेरी इस यात्रा का उद्देश्य उसके बारे में भारतीय नेताओं को जानकारी देना है. आप जानते ही हैं कि नेपाल में संविधान सभा का चुनाव होने वाला है तो उसके लिए भी हम भारत से लॉजिस्टिक सपोर्ट चाहते हैं.

लॉजिस्टिक सपोर्ट! किस तरह का?

हम चाहते हैं कि भारत का निर्वाचन आयोग हमारे निर्वाचन आयोग को चुनाव कराने के तरीके और उसके बंदोबस्त के बारे में जानकारी दे. उसे किस तरह के और कितने सुरक्षा बल और किस तरह की चीजों की जरूरत पड़ेगी, यह बताए और साथ ही सुविधाएं भी मुहैया कराये. राजनीतिक दलों के साथ किस तरह बर्ताव करना चाहिए, इस बारे में भी मार्गदर्शन करे. हम चाहते हैं कि भारत का निर्वाचन आयोग नेपाल के निर्वाचन आयोग के साथ चुनाव की व्यवस्था करने के बारे में अपने अनुभव साझा करे.

Spezialbild: Ausschreitungen in Nepal

इस यात्रा के दौरान यहां आपकी अब तक किनसे मुलाकात हुई और क्या बात हुई?

हमारी यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी से मुलाकात हुई और बहुत अच्छी बातचीत हुई॰ नेपाल के राजनीतिक संक्रमण के बारे में हमने उन्हें जानकारी दी और बताया कि एक संघीय, लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में हम नेपाल का निर्माण करना चाहते हैं जिसकी नींव मजबूत हो. उन्होंने आश्वासन दिया कि भारत इस प्रक्रिया में हर तरह की मदद करने के लिए तैयार है. विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद, संचार मंत्री कपिल सिब्बल और कांग्रेस के विदेश विभाग के प्रमुख डॉक्टर कर्ण सिंह से भी भेंट हुई. विदेश सचिव रंजन मथाई और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन भी मिलने आए. सबसे ही बहुत अच्छी बात हुई॰

इस समय नेपाल के सामने किस तरह की राजनीतिक चुनौतियां हैं?

सबसे पहली चुनौती तो संविधान सभा का चुनाव हैं. पिछली बार हमने संविधान सभा चुनी, लेकिन हम संविधान बना नहीं पाये. हमारी समस्या यह थी कि नेपाल एक यूनिटरी(एक ईकाई वाला) राज्य था. संघीय राज्य का हमें कोई अनुभव नहीं था. संविधान सभा में हमारे जैसी लोकतांत्रिक पार्टियां और कई क्षेत्रीय पार्टियां थी और साथ ही चरमपंथी माओवादी भी थे. इन सब की भावनाओं और आकांक्षाओं को मिलाकर एक संविधान बनाने में हम सफल नहीं हुए. लेकिन इस बार हमें विश्वास है कि पिछली गलतियां हम नहीं दुहराएंगे. लेकिन अब हम लोकतन्त्र के बुनियादी मूल्यों और मान्यताओं पर किसी भी तरह का समझौता किए बगैर सबकी भावनाओं को अपने में शामिल करने वाला संविधान बनाएंगे.

आपकी पार्टी नेपाली कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के बीच इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए क्या सहमति बन पायी है?

इस लक्ष्य पर सभी सहमत हैं. हां, सबका जोर अलग-अलग बिन्दुओं पर है लेकिन इस पर सबके बीच एक राय है.

इस बार आपको क्या संभावना लगती है? क्या चुनाव के बाद संविधान सभा में किसी एक पार्टी को बहुमत मिल पाएगा या जो भी पार्टी सबसे बड़ी होकर उभरेगी, उसे दूसरी पार्टियों से सहयोग लेकर संविधान निर्माण का काम आगे बढ़ाना होगा?

देखिये, पांच साल पहले संविधान सभा के जो चुनाव हुए थे, उस समय माओवादियों की ओर से डराने-धमकाने की काफी घटनाएं हुई थीं. लेकिन अब वह समस्या काफी हद तक कम हो गई है. अब वैसी स्थिति नहीं है इसलिए मुझे लगता है कि हमारी पार्टी नेपाली कांग्रेस बहुमत पाने में सफल होगी क्योंकि वह एक ऐतिहासिक पार्टी है, एकमात्र पूरी तरह से लोकतांत्रिक पार्टी है.

आपने नेपाल के एक लोकतांत्रिक संघीय गणराज्य होने की बात कही. संघीय ढांचे के संदर्भ में मधेसी (तराई के लोगों) के अधिकारों की अक्सर चर्चा होती है. आपके यहां कई मधेसी पार्टियां भी हैं. क्या मधेसी समस्या पर आपकी पार्टी और अन्य पार्टियों के विचारों में स्पष्टता आई है?

मधेसियों की अपनी आकांक्षाएं हैं और उनका हम सम्मान करेंगे.

भारत के साथ आप नेपाल के संबंधों को भविष्य में किस तरह से विकसित करना चाहते हैं? अक्सर नेपाली कांग्रेस पर भारत के ज्यादा नजदीक होने का आरोप लगता रहा है. आप क्या कहेंगे?

भारत और नेपाल का बहुत पुराना और अच्छा संबंध है. पड़ोसी होने के नाते कभी कोई समस्या सामने आ भी सकती है, लेकिन कोई समस्या ऐसी नहीं जिसका समाधान न हो सके. कुछ लोग बढ़ा-चढ़ा कर भी कहते हैं. मेरे विचार में नेपाल में इतनी ज्यादा भारत-विरोधी भावना नहीं है. सभी लोग भारत के साथ अच्छा संबंध रखना चाहते हैं. सब लोगों की इच्छा रहती है कि भारत हमारी ज्यादा मदद करे, वह तो अलग बात है, लेकिन ऐसी कोई बात नहीं है॰

नेपाल में बार-बार भारत-नेपाल संधि की समीक्षा किए जाने की मांग उठती है. आपका क्या कहना है?

इस बारे में तो भारत ने भी कहा है कि वह समीक्षा के लिए तैयार है. इसलिए यह कोई बड़ी समस्या नहीं है. दोनों देश एक-दूसरे के साथ संबंध और भी अच्छे बनाना चाहते हैं.

इंटरव्यूः कुलदीप कुमार, दिल्ली

संपादनः एन रंजन

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