1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

भारत से पलायन करते छात्र

बड़ी संख्या में भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेशी संस्थान चुन रहे हैं. हालांकि अब बात शौक से ज्यादा मजबूरी की हो गई है. विदेश जाकर उनका वापस ना आना देश के विकास की दिशा में खराब संकेत है.

रितु शर्मा ने अभी अभी स्कूल की पढ़ाई पूरी की है. वह अब आगे की पढ़ाई चीन की हार्बिन मेडिकल यूनिवर्सिटी से करना चाहती हैं. ऐसा नहीं है कि रितु विदेश में पढ़ाई करने के लिए उत्सुक है. लेकिन उन्हें भारत के किसी भी सरकारी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन नहीं मिला क्योंकि इनमें सीटों की संख्या ही कम है. किसी दूसरे निजी मेडिकल कॉलेज में फीस भरना आसान बात नहीं.

शर्मा ने डॉयचे वेले को बताया, "मुझे लगता है चीन में मेडिकल की पढ़ाई करने के बाद मेरा भविष्य अच्छा होगा. भारत में निजी कॉलेजों में पढ़ाई बहुत महंगी है. मुझे लगता है जब मैं अपना कोर्स पूरा करके चीन से लौटूंगी तो मेरे पास यहां अच्छी नौकरियों की संभावना होगी."

भारत में कई लोगों का मानना है कि विदेशी स्कूल भारतीय स्कूलों से बेहतर हैं और जो लोग बाहर से डिग्री लेकर आते हैं उनके पास नौकरी की बेहतर संभावनाएं होती हैं.

सस्ती शिक्षा

भारत में करीब 290 मेडिकल संस्थान हैं. इनमें हर साल करीब 31,000 छात्र दाखिला ले सकते हैं. लेकिन एडमिशन के लिए परीक्षा में बैठने वालों की संख्या करीब साढ़े तीन लाख है.

भारत के राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड के अनुसार पिछले कुछ सालों में एडमिशन के इच्छुक छात्रों की संख्या में वृद्धि हुई है. बोर्ड के कार्यकारी निदेशक बिपिन बत्रा ने डॉयचे वेले से कहा, "साल 2000 से संख्या में वृद्ध हुई है." उन्होंने बताया जिन छात्रों को यूरोप और अमेरिका में दाखिला नहीं मिल पाया उन्होंने चीन, रूस, यूक्रेन और नेपाल को चुना.

शिक्षाविदों का मानना है कि भारतीय छात्रों को चीन कई तरह से अपनी तरफ लुभा रहा है. चीन में 52 यूनिवर्सिटियों में मेडिकल की पढ़ाई होती है. वहां फीस भारतीय संस्थानों के मुकाबले करीब आधी है. इन कॉलेजों में रहने और खाने का भी बढ़िया इंतजाम होता है.

Geschäftsleute mit Fragezeichen

यही है वह 'सवाल का निशान' जिसे आप तलाश रहे हैं. इसकी तारीख 05/12 और कोड 8659 हमें भेज दीजिए ईमेल के ज़रिए hindi@dw.de पर या फिर एसएमएस करें +91 9967354007 पर.

भारत के लिए चिंता

पढ़ाई पूरी करने के बाद कई छात्र भारत वापस नहीं जाना चाहते हैं. पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉक्टर श्रीनाथ रेड्डी मानते हैं कि भारतीय छात्रों का विदेशों में बस जाना भारतीय सरकार के लिए भी चिंताजनक स्थिति है. यह भारत के विकास के लिए खराब संकेत है. उन्होंने डॉयचे वेले से कहा, "इसीलिए भारत में अच्छे डॉक्टर पर्याप्त संख्या में नहीं हैं."

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में दस हजार लोगों पर केवल छह डॉक्टर ही उपलब्ध हैं. जबकि चीन और अमेरिका में इतने ही लोगों के लिए 14 और 26 डॉक्टर हैं.

भारतीय मेडिकल संघ के अधिकारी डॉक्टर केके अग्रवाल मानते हैं कि मेडिकल संस्थानों को अपने यहां सीटों की संख्या बढ़ानी चाहिए. उन्होंने डॉयचे वेले से कहा, "मैं आशा करता हूं कि भारत सरकार इस ओर ध्यान दे और नए मेडिकल संस्थान खोले ताकि छात्रों को विदेश ना जाना पड़े. बल्कि दूसरे देशों के छात्र भारत आएं."

रिपोर्ट: मुरली कृष्णन/ एसएफ

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

DW.COM