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दुनिया

भारत सरकार की हज सबसिडी ठीकः सुप्रीम कोर्ट

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हज को जाने वाले मुसलमानों के लिए रियायत या उन्हें अन्य तरह की सुविधाएं दी जाती हैं, या किसी और धर्म के लोगों को मिलने वाली सुविधाएं संविधान का उल्लंघन नहीं है.

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सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि हज के लिए जाने वाली सब्सिडी संविधान के अनुच्छेद 14, 15बी और 27 का उल्लंघन है.

जस्टिस मार्कंडेय काट्जू और ज्ञानसुधा मिश्रा की खंडपीठ ने एक आदेश में कहा कि तीर्थयात्रा की सब्सिडी के जनता के धन से थोड़ा हिस्सा लिया जाना असंवैधानिक नहीं है.

"हमारे विचार में अनुच्छेद 27 का उल्लंघन तब होता जब भारत के कुल आयकर का हिस्से के या कस्टम ड्यूटी या बिक्री का कर का एक बड़ा हिस्सा किसी धर्म के लिए खर्च किया जाता. दूसरे

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शब्दों में भारत के आयकर का 25 फीसदी अगर किसी धर्म के लिए खर्च किया जाता तो अनुच्छेद 27 का उल्लंघन होता." सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहते हुए बीजेपी के पूर्व सांसद प्रफुल्ल गोरदिया की याचिका खारिज कर दी.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ राज्य पाकिस्तान में तीर्थयात्रा के लिए हिंदुओं और सिखों को रियायत देते हैं जो भारत के कर का बहुत छोटा हिस्सा है.

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, "14वें या 15 अनुच्छेद का भी उल्लंघन नहीं होता क्योंकि सुविधाएं भी दी जाती हैं और केंद्र और राज्य सरकार खर्च भी देती है सभी धर्मों के लिए. इसलिए इसमें कोई भेदभाव नहीं है. भारत में बहुत विविधता है. और संविधान को बनाने वाले लोगों ने यह ध्यान रखा कि देश की धर्मनिरपेक्षता बनी रहे. 1947 में हुए विभाजन और दंगों के दौरान जब बहुत लोग मारे गए, घायल और विस्थापित हुए. धार्मिक भावनाओं को हवा दी गई. ऐसे समय में धीरज रखना मुश्किल होता है. हमारे संविधान के निर्माताओं का पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में दिमाग ठंडा था और उन्होंने भारत को हिंदू देश के बजाए धर्मनिरपेक्ष देश घोषित किया. उस समय यह मुश्किल फैसला था क्योंकि पाकिस्तान ने खुद को इस्लामिक देश घोषित किया था. इसलिए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और दूसरे नेताओं पर निश्चित ही बहुत दबाव रहा होगा कि वह भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करें. लेकिन यह उनकी महानता थी कि उन्होंने इस दबाव को हावी नहीं होने दिया और भारत को धर्मनिरपेक्ष देश घोषित किया."

रिपोर्टः पीटीआई/आभा एम

संपादनः एमजी

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