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दुनिया

भारत में स्कूलों से मुंह मोड़ते बच्चे

सबीना, दृष्टि, सलीम और पल्टू में कई समानताएं हैं. चारों कोलकाता के पूर्वी छोर पर बसी एक झोपड़पट्टी में रहते हैं. यह लोग स्कूल नहीं जाते. यूनेस्को के मुताबिक भारत में छह से 11 साल की उम्र के 14 लाख बच्चे स्कूल नहीं जाते.

सबीना और पल्टू पहले स्कूल जाते थे. लेकिन अब उन्होंने जाना छोड़ दिया. सबीना अब घर के कामकाज में मां का हाथ बंटाती है और पल्टू अपने पिता की चाय की दुकान में उनकी सहायता करता है. यह देश के उन लाखों बच्चों में शामिल हैं जिन्होंने या तो कभी स्कूल का मुंह ही नहीं देखा या फिर विभिन्न वजहों से अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ चुके हैं. देश में पांच साल पहले ही बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून पारित किया गया था, लेकिन फिर भी 14 लाख बच्चे स्कूल नहीं जाते. दुनाया भर में आसे बच्चों की तादाद पौने छह करोड़ है.

यूनेस्को की रिपोर्ट

यूनेस्को की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में छह से 11 साल की उम्र तक के लगभग 14 लाख बच्चे स्कूल नहीं जाते. इस मामले में नाइजीरिया, पाकिस्तान और सूडान के बाद भारत का चौथा स्थान है. इससे वर्ष 2015 तक तमाम बच्चों को स्कूल तक लाने का लक्ष्य खटाई में पड़ता नजर आ रहा है. इतनी बड़ी तादाद में बच्चों के स्कूल नहीं जाने के बावजूद देश में प्राथमिक शिक्षा में सरकारी सहायता में कटौती की गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के पड़ोसी नेपाल ने अपने स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की तादाद घटा कर एक फीसदी कर ली है.

रिपोर्ट के मुताबिक देश में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी खर्च में भारी कटौती भी इस समस्या की एक प्रमुख वजह है. वर्ष 2010 से 2012 के बीच के दो वर्षों के दौरान इस क्षेत्र को सरकारी सहायता में करोड़ों रुपए की कटौती की गई. यूनेस्को की महानिदेशक ईरीना बोकोवा कहती हैं, "सरकारी सहायता में भारी कटौती और दूसरी वजहों से स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की बढ़ती तादाद से यह अंदेशा मजबूत हो गया है कि वर्ष 2015 तक सबके लिए प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य हासिल करना संभव नहीं है." वह कहती हैं कि यह आंकड़े खतरे की घंटी हैं. इस दिशा में पहल कर राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत करनी होगी ताकि बच्चों के शिक्षा के अधिकार को उचित सम्मान मिल सके.

सुविधाओं का अभाव

आखिर इन बच्चों के स्कूल नहीं जाने या बीच में ही पढ़ाई छोड़ने की क्या वजह है? विशेषज्ञों का कहना है कि बाल मजदूरी और लड़कियों की कम उम्र में शादी के अलावा बच्चों के स्कूल नहीं जाने की कई और वजहें हैं. इनमें स्कूलों में पढ़ाई का स्तर खराब होना, शौचालय की सुविधा का अभाव और जातिगत आधार पर भेदभाव शामिल है. सबीना की मां रुखसार कहती हैं, "पहले सबीना सरकारी स्कूल में जाती थी. लेकिन वहां शौचालय की कोई सुविधा नहीं थी. इससे काफी परेशानी होती थी. नतीजतन तीन साल बाद उसने स्कूल जाना छोड़ दिया."

पल्टू के पिता सुबल साहा कहते हैं, "स्कूल में मेरे बेटे के साथ भेदभाव होता था. उसे अगड़ी जाति के बच्चों के बाद खाना मिलता था. इसके अलावा सहपाठियों के साथ-साथ शिक्षक भी उन पर टिप्पणी करते रहते थे. इससे उसका मन उचट गया." सलीम के रिक्शाचालक पिता मुख्तार कहते हैं, "मेरे पास बच्चे की स्कूल फीस देने लायक पैसे ही नहीं हैं. सरकारी स्कूल में तो कोई पढ़ाई ही नहीं होती. इसलिए मैंने उसे घर पर ही पढ़ने को कहा है." सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में 76 फीसदी प्राथमिक स्कूलों का संचालन सरकार करती है. लेकिन उनमें से आधे में शौचालय की सुविधा नहीं है. निजी स्कूलों में यह सुविधा है. लेकिन पिछड़े व गरीब तबके के लोग उनकी महंगी फीस का बोझ नहीं उठा सकते.

सुधार के उपाय

राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा आयोग की अध्यक्ष शांता सिन्हा कहती हैं, "आयोग ने हाल में देश के तीन सौ जिलों में प्राथमिक स्कूलों का सर्वेक्षण किया था. उससे पता चला कि 37 फीसदी स्कूलों में भाषा, 31 फीसदी में सामाजिक अध्ययन और 29 फीसदी में विज्ञान व गणित के शिक्षक ही नहीं हैं." वह कहती हैं कि नर्सरी शिक्षा को भी शिक्षा के अधिकार में शामिल करना होगा. इसके अलावा 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई को इस कानून के दायरे में लाना होगा. उसके बाद ही हालत सुधर सकती है.

एक गैर-सरकारी संगठन सेव द चाइल्ड के कार्यकर्ता दीपंकर दास कहते हैं, "शिक्षा के अधिकार कानून पर पूरी तरह अमल नहीं हो सका है. सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और सुविधाओं की भारी कमी है." इस बीच केंद्र सरकार स्थिति को सुधारने के कदम उठा रही है. केंद्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने राज्य सरकारों से देश के 14.5 लाख देहाती स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय और साफ पानी की व्यवस्था करने को कहा है. स्कूलों में पानी की उपलब्धता को प्राथमिक जरूरत बताया गया है.

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

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