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दुनिया

भारत में लाठीचार्ज में पुलिसकर्मी खुद होते हैं घायल

माना जाता है कि पुलिस लाठी चार्ज में प्रदर्शनकारी को ज्यादा नुकसान पहुँचता है, लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आकड़े बताते हैं कि लाठी बरसाने वाले पुलिस खुद ऐसे मौकों पर ज्यादा घायल होते हैं.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो एनसीआरबी के ताजा आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं. ब्यूरो के 2015 के आंकड़ों के अनुसार पुलिस और प्रदर्शनकारियों की भिड़ंत से जुड़े कुछ दिलचस्प तथ्य उभर कर सामने आये हैं. भारत में पुलिस प्रदर्शनकारियों और उपद्रवियों से निपटने के लिए लाठी चार्ज का प्रयोग कम करने लगी है. एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो साल से विभिन्न राज्यों की पुलिस, लाठी बरसाने में अधिक संयम बरत रही हैं. 2015 में भारत में 327 बार पुलिस को लाठी चार्ज का सहारा लेना पड़ा था. जबकि 2014 में यह संख्या 382 थी. यानी पिछले साल लाठी चार्ज के प्रयोग में लगभग 15 प्रतिशत की कमी दर्ज की गयी.

लाठी चार्ज के मामलों में घायल होने वाले पुलिसकर्मियों की संख्या आम नागरिकों के मुकाबले कहीं ज्यादा है. 2015 में इन घटनाओं में 696 पुलिसकर्मी घायल हुए जबकि घायल प्रदर्शनकारियों की संख्या महज 298 ही थी. इसी तरह 2014 के आकड़ों में भी पुलिसकर्मियों के घायल होने की संख्या ज्यादा थी. तब लाठी चार्ज में 557 पुलिसकर्मियों को चोटें आयी थी जबकि घायल हुए आम लोगों की संख्या महज 262 ही थी.

बेहाल कश्मीर पुलिस

2015 के आंकड़े बताते हैं कि कश्मीर में कुल 207 बार लाठी चार्ज हुआ. राज्य के अलग अलग जगहों पर हुए लाठी चार्ज में सिर्फ 24 आम नागरिक घायल हुए लेकिन इनमें घायल पुलिसकर्मियों की संख्या 411 रही. इन आकड़ों से तो यही लगता है कि कश्मीर में पुलिस आम तौर पर अपने बचाव के लिए ही लाठीचार्ज करती है. वहीँ 2014 में कश्मीर में प्रदर्शनकारियों या उपद्रवियों पर पुलिस को 304 बार लाठी चार्ज करना पड़ा था लेकिन उस साल भी आम लोगों के मुकाबले घायल पुलिसकर्मियों की संख्या ज्यादा थी. तब 138 आम लोग घायल हुए थे और इन लाठी चार्ज के दौरान 289 पुलिस वालों को चोटें आयी थी.

आक्रामक है यूपी पुलिस

आकड़ों के अनुसार लाठी बरसाने के मामले में यूपी पुलिस कश्मीर की पुलिस के बाद दूसरे नंबर पर है लेकिन इस दौरान पुलिसकर्मी और आम लोगों के घायल होने के अनुपात के मामले में यूपी पुलिस बाक़ी राज्यों की पुलिस से अलग है. पिछले साल अलग अलग जगहों पर हुए 62 लाठीचार्ज में 197 आम नागरिक घायल हुए वहीँ 90 पुलिसकर्मियों को चोट आयी. इन आकड़ों से यही लगता है कि यूपी पुलिस को कानून और व्यवस्था बनाये रखने के लिए ज्यादा आक्रामक होना पड़ता है. हालांकि 2014 में उत्तर प्रदेश की स्थिति ऐसी नहीं थी. तब हुए 28 लाठी चार्ज में केवल 25 आम लोग घायल हुए थे जबकि घायल पुलिसकर्मियों की संख्या 83 थी.

फायरिंग में राजस्थान सबसे आगे

जहां तक पुलिस फायरिंग का मामला है, राजस्थान पुलिस फायरिंग के मामले में पहले स्थान पर है जबकि दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र और तीसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश हैं. राजस्थान पुलिस द्वारा पिछले साल किये गए 35 फायरिंग में 18 पुलिसकर्मी और 2 नागरिक घायल हुए. पुलिस फायरिंग के दौरान मौत के मामले में उत्तरप्रदेश सबसे आगे है. यहां 29 फायरिंग के मामलों में 9 नागरिकों की मौत हुई और 12 लोग घायल भी हुए. महाराष्ट्र में पिछले साल हुई पुलिस फायरिंग की 33 घटनाओं में 92 पुलिसकर्मी घायल हुए, वहीँ दो पुलिस कर्मी और तीन आम लोगों की मौत भी इन फायरिंग के दौरान हुई.

वैकल्पिक उपायों पर हो रहा है विचार

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बढ़ते दबाव और जन आक्रोश के चलते अब सरकारें, पुलिस को लाठी चार्ज की अनुमति नहीं देतीं. बहुत ज़रूरी होने पर ही लाठी चार्ज या फायरिंग की अनुमति पुलिस को दी जाती है. इसका कुछ असर एनसीआरबी के आंकड़ों में भी दिखायी दे रहा है. नागरिक और पुलिस के बीच के रिश्तों को मज़बूत बनाने के लिए सभी राज्यों की पुलिस को संयम बरतने की सलाह और ट्रेनिंग दी जा रही है.

उग्र और बेकाबू प्रदर्शनकारियों पर काबू पाने के लिए पुलिस हाईटेक मशीनों का सहारा लेने जा रही है. दिल्ली पुलिस प्रदर्शनकारियों से सख्ती किए बिना असरदार तरीके से निपटने के लिए लॉन्ग रेंज अकूस्टिक डिवायस का इस्तेमाल करने की योजना बना रही है. यह डिवायस बेचैन करने वाली आवाज निकालती है, जिसे बर्दाश्त करना आम आदमी के वश की बात नहीं है. मशीन को चालू करते ही 2 किलोमीटर तक के दायरे में जमा लोग इसकी आवाज के प्रभाव में आ जायेंगे. इस मशीन से एक खतरा भी है, जो लोग इसके काफी करीब रहेंगे वह अस्थायी रूप से बहरे भी हो सकते हैं.