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ताना बाना

भारत में रेडियो एक्टिविटी के ख़तरे

दिल्ली के एक कबाड़ व्यवसायी के पास घातक रेडियोएक्टिव पदार्थ कोबाल्ट-60 मिलने से भारत में रेडियोएक्टिव कचरे के निपटारे में बरती जा रही लापरवाही पर सवाल खड़े हो गए हैं. क्या भारत परमाणु प्रौद्योगिकी के लिए तैयार है?

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आज जब परमाणु प्रौद्योगिकी की बात होती है तो सबसे पहले रूस के चेर्नोबिल के परमाणु रिएक्टर का हादसा आंखों के सामने कौंध जाता है. आज जहां एक तरफ पूरी दुनिया रेडियोएक्टिव वेस्ट का उचित ढंग से निपटारा किए जाने पर ज़ोर दे रही है, परमाणु संसाधनों के आतंकवादियों के हाथ में पड़ने से रोकने के तरीकों पर विचार किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली में रेडियोधर्मी कचरा रद्दी के रुप में बेचा जाना और फिर इस कचरे में रेडियोधर्मी कोबाल्ट 60 के संपर्क में आने से एक की मौत और कुछ लोगों के घायल हो जाने की खबरों ने भारत को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है.

विज्ञान और पर्यावरण केन्द्र में काम कर रहे कुशल यादव कहते हैं कि सिर्फ रेडियोधर्मी कोबाल्ट 60 ही नहीं, भारत में उत्पन्न होने वाले पूरे रेडियोधर्मी कचरे का हम ठीक से निपटान नहीं कर पा रहे हैं. " परमाणु बिजली संयंत्रों से जो कचरा निकलता है उस पर तो पूरा ध्यान दिया जा रहा है. लेकिन छोटे संयंत्रों से आने वाले कचरे पर भारत को सख़्त होने की ज़रूरत है. अस्पतालों और प्रयोगशालाओं से निकलने वाला रेडियोएक्टिव वेस्ट एक बहुत बड़ा मुद्दा है."

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर रेडियोएक्टिव वेस्ट के ठीक से निपटारे के कड़े नियम लागू नहीं किए गए तो मायापुरी जैसे कई हादसों का सामना भारत को आगे भी करना पड़ सकता है.

रेडियोएक्टिव कचरे से ख़तरा

भारत में रेडियोएक्टिव चीज़ों का बाज़ार बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है. देश में दुनिया भर से रोज़ जहाजों में भर-भरकर कचरा पहुँचता है जिनमें तरह-तरह के रासायनिक पदार्थ होते हैं. इस रद्दी और कचरे को भारत में री-साइकल किया जाता है. इससे बाल्टियां, खिलौने वगैरह तक बनाए जाते हैं. जबकि, अमेरिका व यूरोप जैसे विकसित देशों ने इस तरह की री-साइक्लिंग पर पाबंदी लगा रखी है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन पदार्थां में पाए जानेवाले रेडियोएक्टिव व अन्य पदार्थों से कैंसर, दिमाग़ी बीमारियों और रक्तवाहिकाओं को नुकसान पहुँचने के खतरे जुड़े हैं.

भारत में अभी तक इन सभी खतरों को नजंरअंदाज़ किया जाता रहा है. इस उद्योग से बहुत सारे लोग मुनाफ़ा कमा रहे हैं. साथ ही साथ इन पदार्थों के संपर्क में आने से कई मासूमों की जान जा रही है और पर्यावरण के साथ खिलवाड़ भी हो रहा है.

परमाणु प्रौद्योगिकी के लिए भारत कितना तैयार

परमाणु प्रौद्योगिकी हासिल करके भारत ने विश्व में नाम तो कमाया, लेकिन इसके बुरे असर से अपने आप को बचाने और उन पर काबू पाने के लिए भी क्या भारत तैयार है? कुशल यादव कहते हैं कि, "अगर हम इस टेक्नोलॉजी का लाभ उठाना चाहते हैं तो इसका रखरखाव, इससे जुड़े़ ख़तरे और उन खतरों से निपटने के समाधानों की पूरी जानकारी हमारे पास होनी चाहिए ."

रेडियोधर्मिता न केवल बीमारी फैलाती है बल्कि इसका असर आने वाली कई पीढ़ियों पर भी पड़ता है. तो ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि को बरकरार रख़ने के लिए भारत को इस क्षेत्र में सोच-विचार कर सावधानी से आगे बढ़ना पड़ेगा.

रिपोर्ट: एजेंसियां/श्रेया कथूरिया

संपादन: महेश झा