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मनोरंजन

भारत में मिट गईं 200 से ज्यादा भाषाएं

भारत की 22 आधिकारिक भाषाओं के अलावा और कितनी होंगी जिनके बारे में आपको पता भी नहीं है, कभी सोचा है? ताजा शोध के अनुसार भारत की 200 से ज्यादा भाषाएं ऐसी हैं जिन्होंने पिछले 50 सालों में दम तोड़ दिया.

गैर सरकारी संगठन 'भाषा' ट्रस्ट के किए शोध के बाद जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरीकरण और प्रवास की भागमभाग में करीब 230 भाषाओं का नामो निशान मिट गया. 'कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी' जैसी पहचान वाला देश भारत सिर्फ इन भाषाओं को ही नहीं खो रहा है, बल्कि इनके साथ जुड़ी अपनी पहचान से भी दूर होता जा रहा है.

शहरीकरण के विस्तार के साथ खानाबदोश आदिवासी समुदाय भी अपनी प्राचीन भाषाएं छोड़ते जा रहे हैं. पिछले चार सालों से देश भर में किए शोध से पता चला कि 230 भाषाएं भुलाई जा चुकी हैं जिनमें ज्यादातर कबायली भाषाएं है, और 870 भाषाएं अभी जिंदा हैं.

भाषा ट्रस्ट के संस्थापक और लेखक गणेश डेवी ने चार साल पहले इस सर्वे की शुरुआत की थी. उन्होंने बताया कि बची हुई भाषाओं में 480 कबायली भाषाएं हैं. वह कहते हैं कि भाषाओं का इतनी तेजी से खत्म होना चिंताजनक है.

डेवी और उनकी 3,000 लोगों की टीम ने भारत के सुदूर इलाकों में जाकर इन भाषाओं के बारे में रिसर्च की. उन्होंने इन इलाकों के लोक गीतों, कहानियों और बोलचाल में इस्तेमाल होने वाली भाषाओं के बारे में जानकारी इकट्ठा की. इसके बाद डेवी की टीम ने इन आंकड़ों की तुलना भारत सरकार की 1961 में हुई रिसर्च के आंकड़ों से की. उस रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1,100 भाषाएं इस्तेमाल हो रही थीं.

डेवी ने बताया कि लुप्त होने वाली भाषाओं में ज्यादातर तटवर्ती इलाकों में रहने वाले मछुआरों की भाषाएं हैं. बेरोजगारी ने इन्हें शहरों की तरफ खींचा और धीरे धीरे वे अपनी भाषाएं खो बैठे. आमतौर पर मछली पकड़ने या समुद्री इलाकों में इस्तेमाल होने वाली शब्दावली का इस्तेमाल शहरों में नहीं होता.

भारत में अंडमान से हिमालय तक के विस्तार में करीब 190 कबायली समुदाय फैले हुए हैं, जिनकी कुल आबादी करीब 6 करोड़ है. डेवी ने कहा, "केवल भारत ही ऐसा देश है जहां 200 से ज्यादा सालों तक ब्रिटिश साम्राज्य होने के बाद भी 800 से ज्यादा भाषाएं अपना अस्तित्व बचा पाईं." वह मानते हैं कि भाषाओं के विलुप्त होने की अगर बात हो रही है तो उन भाषाओं की बात भी होनी चाहिए जो अभी जिंदा हैं.

लंबे समय से यह भी विवाद रहा है कि भारत में हिन्दी राष्ट्रीय भाषा होने के बाद भी खुद लोग हिन्दी का इस्तेमाल करने में शर्माते हैं. बड़े बड़े स्कूलों, कॉलेजों और कार्यालयों में कामकाज और व्यवहार की भाषा की जगह अंग्रेजी पहले ही ले चुकी है.

एसएफ/एनआर (एएफपी)

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