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दुनिया

भारत में महिलाओं की हालत सुधरी, पर मंजिल अभी दूर

भारत में महिलाओं की स्थिति को लेकर हमेशा चिंता जतायी जाती है. लेकिन पिछले कुछ सालों में सरकारी प्रयासों और समाज में बदलाव के चलते महिलाओं की स्थिति सुधर रही है.

समाज और परिवार में महिलाओं की स्थिति में धीरे धीरे ही सही, पर सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है. यह परिवर्तन शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक के आंकड़ों में दिखाई देता है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की हाल ही में जारी रिपोर्ट में महिलाओं की स्थिति को लेकर कुछ खुशखबरी हैं, और कुछ चिंताएं भी. सर्वेक्षण में प्रजनन, बाल और शिशु मृत्यु दर, परिवार नियोजन पर अमल, मातृ और शिशु स्वास्थ्य, पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता आदि का विवरण है.

बढ़ती भागीदारी

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है. शिक्षण संस्थानों तक लड़कियों की पहुँच लगातार बढ़ रही है. एक दशक पहले हुए सर्वेक्षण में शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी 55.1 प्रतिशत थी जो अब बढ़ कर 68.4 तक पहुंच गयी है. यानी इस क्षेत्र में 13 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर्ज की गयी है.

बाल विवाह की दर में गिरावट को भी महिला स्वास्थ्य और शिक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. कानूनन अपराध घोषित किये जाने तथा सामाजिक तौर पर लगातार जागरूकता फैलाने के बावजूद बाल विवाह का चलन अब भी बरकरार है.

वैसे, संतोष की बात है कि इसमें गिरावट आ रही है. 18 वर्ष से कम उम्र में शादी 2005-06 में 47.4 प्रतिशत से घट कर 2015-16 में 28.8 रह गयी है. इस कमी का सीधा फायदा महिला स्वास्थ्य के आंकड़ों पर भी पड़ा है.

सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार बैंकिंग व्यवस्था में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ी है. एक दशक पहले सिर्फ 15 प्रतिशत महिलाओं के पास अपना बैंक खाता था. नवीनतम आंकड़ों के अनुसार अब 53 प्रतिशत महिलाएं बैंकों से जुड़ चुकी हैं.

घर में सम्मान

शिक्षा और जागरूकता का असर घरेलू हिंसा पर भी पड़ा है. अब इस तरह के मामले पहले से कम हुए हैं. रिपोर्ट के अनुसार वैवाहिक जीवन में हिंसा झेल रही महिलाओं का प्रतिशत 37.2 से घटकर 28.8 प्रतिशत रह गया है. सर्वे में यह भी पता चला कि गर्भावस्था के दौरान केवल 3.3 प्रतिशत को ही हिंसा का सामना करना पड़ा.

इस सर्वेक्षण से यह भी सामने आया है कि 15 से 49 साल की उम्र में 84 प्रतिशत विवाहित महिलाएं घरेलू फैसलों में हिस्सा ले रही है. इससे पहले 2005-06 में यह आंकड़ा 76 प्रतिशत था. ताजा आंकड़ों के अनुसार लगभग 38 प्रतिशत महिलाएं अकेली या किसी के साथ संयुक्त रूप से घर या जमीन की मालकिन हैं.

और प्रयास की जरूरत 

महिला सशक्तिकरण की दिशा में देश में प्रगति हुई है लेकिन बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ और प्रयासों की ज़रूरत है. लिंगानुपात के मोर्चे पर देश ज्यादा प्रगति नहीं कर पाया है. पिछले पांच वर्षों में जन्म के समय लिंगानुपात मामूली रूप से सुधरकर प्रति एक हजार लड़कों पर 914 लड़कियों से बढ़कर 919 हो गया है. शहरी भारत में यह आंकड़ा 899 ही है. हरियाणा में लिंगानुपात 836 है जबकि पड़ोसी पंजाब का 860 है. मध्यप्रदेश में लिंगानुपात 960 से गिरकर 927 तक पहुंच गया है. दादरा नगर हवेली में लिंग अनुपात सबसे अधिक 1013 है.

शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ है, इसलिए इस प्रसूति मौतों के मामलों में कमी आयी है. हालाँकि गांवों की स्थिति अभी ज्यादा नहीं बदली है. यूनिसेफ के अनुसार भारत में प्रसव के दौरान होने वाली मौतें पहले से घटी हैं, लेकिन यह अब भी बहुत ज्यादा हैं. देश में हर साल लगभग 45 हजार महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती है.

डॉक्टर महिलाओं की सेहत को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर जोर देते हैं. स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ रमा कहती हैं कि स्वास्थ्य सुविधाओं के थोड़े और विस्तार से और जागरूकता अभियान के जरिये प्रसव के दौरान होने वाली मौतों में कमी लायी जा सकती है. डॉ ईशा वर्मा कहती हैं कि अधिकतर महिलाएं रक्त अल्पता से पीड़ित हैं. अपने परिवार के स्वास्थ्य को लेकर ज्यादा चिंतित रहने वाली महिलाएं अगर खुद पर ध्यान देने लग जाए तो परिवार का स्वास्थ्य अपने आप अच्छा हो जायेगा. वे कहती हैं, ‘आखिरकार महिला ही तो परिवार का केंद्र है.'

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