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खेल

भारत में फॉर्मूला वन पंचर

इस हफ्ते के आखिर में होने वाली फॉर्मूला वन की रेस के बाद भारत मेजबानों की सूची से बाहर हो सकता है. आयोजकों का कहना है कि भारत में रेस होती रहे इसके लिए वो हर संभव कोशिश करेंगे.

2014 के फॉर्मूला वन कैलेंडर से भारत के बाहर होने के पीछे फॉर्मूला वन के प्रमोटरों ने "तार्किक" कारणों का हवाला दिया है, लेकिन 45 करोड़ डॉलर खर्च कर पूरे शानो शौकत से बनवाए गए बुद्धा सर्किट पर इसके बाद फॉर्मूला वन की वापसी होगी कि नहीं यह अभी निश्चित नहीं है. फॉर्मूला वन के मुखिया बर्नी एक्लेस्टन ने कहा है कि भारत 2015 की शुरूआत में इस कैलेंडर में वापस आ जाएगा, हालांकि कैलेंडर पूरी तरह भरा हुआ है और उसमें जगह के दावेदारों की कमी नहीं है.

भारत के मोटर स्पोर्ट्स क्लबों के फेडरेशन के प्रमुख विकी चंडोक ने रविवार का रेस सफल रहने की उम्मीद जताई है. चंडोक ने कहा, "जब दूसरे देशों के ट्रैक जगह पाने के लिए संघर्ष कर रहे हों तो हम 2015 में इससे बाहर नहीं रह सकते. मुझे उम्मीद है कि प्रमोटर फॉर्मूला वन की दो और रेस कराने के लिए सहमति हासिल कर लेगें."

बर्नी एक्लेस्टन ने इसी साल जुलाई में कहा था कि "राजनीतिक" कारणों की वजह से भारत 2014 के फॉर्मूला वन कैलेंडर से बाहर हो गया, लेकिन भारतीय आयोजक इस बात को लेकर विश्वास से भरे हैं कि पांच रेस का उनका करार पूरा होगा. जेपी स्पोर्ट्स इंटरनेशनल लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी समीर गौड़ का कहना है, "वो चाहते थे कि रेस मार्च में हो लेकिन यह व्यवहारिक नहीं था. इस बात में कोई संदेह नहीं कि हम 2015 में वापस लौटेंगे."

भारतीय ग्रां प्री को अर्थव्यवस्था के बुरे दौर का भी सामना करना पड़ रहा है एक तरफ रुपया लुढ़क रहा तो दूसरी तरफ सरकार इस खेल को लेकर बेपरवाह है. पैसों की व्यवस्था न होने के साथ ही स्थानीय ड्राइवर की भी कमी है. प्रमोटरों को हर साल करीब 4-4.5 करोड़ डॉलर लाइसेंस फीस के रूप में देने पड़ते हैं तो दूसरी तरफ भारत सरकार से रेस कराने की मंजूरी लेने में करीब 16 लाख डॉलर लगते हैं. विज्ञापनों और दूसरे तरीकों से होने वाली कमाई भी फॉर्मूला वन को चली जाती है.

स्थानीय आयोजकों के पास कमाई का केवल एक ही जरिया होता है टिकटों की बिक्री उसमें भी काफी कमी आई है. एक लाख दर्शकों की क्षमता वाले सर्किट में 2011 की पहली रेस में 95,000 दर्शक आए लेकिन पिछले साल केवल 65,000 दर्शक ही पहुंच सके. टिकटों की बिक्री में इस साल भी कमी आती दिख रही है. इसके अलावा फॉर्मूला वन को खेल न मान कर सरकार ने एक दुलत्ती और मारी है. इसका मतलब है कि आयोजकों को रेस से जुड़ी हर चीज पर टैक्स और कस्टम ड्यूटी देनी होगी. इसी हफ्ते उत्तर प्रदेश सरकार ने हर टिकट पर मनोरंजन कर लगाने का भी एलान कर दिया है. जो इसी साल से लागू हो गया है. इस बीच गुरुवार को भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने भारत में होने वाली फॉर्मूला वन रेस के दौरान होने वाली कमाई पर मनोरंजन कर चुकाने से जुड़ी एक जनहित याचिका को स्वीकार कर लिया है. याचिकाकर्ता की दलील है कि आयोजकों ने 2012 में मनोरंजन टैक्स नहीं चुकाया था और इसलिए रेस पर रोक लगा दी जानी चाहिए.

तमाम विवादों के बीच रविवार को भारत में 2013 की फॉर्मूला वन रेस होने जा रही है. उम्मीद है कि तीन साल से चैम्पियन रह रहे जर्मन ड्राईवर सेबास्टियन फेटल इस बार भी लगातार चौथी बार चैम्पियन बन सकते हैं. फेटल भारत में बीती दो रेसें जीत चुके हैं, अगर इस बार भी वो बुद्धा सर्किट के बादशाह साबित हुए तो उनके चौथी बार चैम्पियन बनने पर पक्की मुहर लग जाएगी.

एनआर/ओएसजे (एएफपी)

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