भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के मायने | ब्लॉग | DW | 20.11.2015
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ब्लॉग

भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के मायने

भारत में रहने वाले हर सौ में से केवल 17 लोग ऐसे हैं जो सबको अपने-अपने धर्म का पालन करने और उसका प्रचार करने की आजादी मिलने का समर्थन नहीं करते. किसी भारतीय के लिए प्यू रिसर्च के सर्वेक्षण के नतीजे जरा भी नहीं चौंकाते.

अमरीका के थिंक टैंक प्यू रिसर्च के एक सर्वेक्षण में यह जानकारी सामने आई है कि जहां धार्मिक स्वतंत्रता में विश्वास रखने वालों का विश्व भर का औसत 74 प्रतिशत है, वहां भारत में यह 83 प्रतिशत है. यानी भारत में रहने वाले एक सौ व्यक्तियों में से केवल 17 ऐसे हैं जो इस बात में यकीन नहीं करते कि सभी को अपने-अपने धर्म का पालन करने और उसका प्रचार करने की आजादी मिलनी चाहिए. यूं किसी भी भारतीय के लिए प्यू रिसर्च के सर्वेक्षण का नतीजा जरा भी चौंकाने वाला नहीं है, लेकिन विदेशियों को यह अजीब लग सकता है कि अन्य देशों की तुलना में भारत में धार्मिक सहिष्णुता काफी अधिक है जबकि यहां हजारों साल से अनेक धर्मों के अनुयायी रहते आए हैं और उनके बीच स्वाभाविक तौर पर कभी-कभी टकराव भी हो जाता है.

माना जाता है कि भारत में ईसाई धर्म 52 में संत थॉमस के साथ केरल में आया. केरल ही में 629 में भारत की पहली मस्जिद का निर्माण हुआ. उस समय भी न तो हिन्दू शासकों ने और न ही यहां रहने वाले हिंदुओं ने ईसाई धर्म और इस्लाम के प्रचार का कोई विरोध किया. भारत में जन्मे धर्मों में केवल बौद्ध और सिख धर्म ही ऐसे हैं जो अन्य धर्मावलंबियों का धर्मांतरण करते हैं. हिन्दू और जैन ऐसा नहीं करते, लेकिन यदि कोई अन्य धर्मावलंबी हिन्दू या जैन बनना चाहे तो उस पर पाबंदी भी नहीं है. इसीलिए हिन्दू समाज में धर्म बदलने के प्रति नैसर्गिक रूप से वितृष्णा बल्कि जुगुप्सा है और आम हिन्दू इसे अच्छी निगाह से नहीं देखता. इसीलिए जब भी हिंदुओं के ईसाई या मुसलमान बनने की खबर आती है, तो उस पर हिंदुओं की प्रतिक्रिया अच्छी नहीं होती. वह तब तो और अधिक उग्र हो जाती है जब यह संदेह हो कि धर्मांतरण के पीछे धार्मिक नहीं, अन्य कारण हैं---मसलन, आर्थिक लालच.

इसके बावजूद यह भी सच है कि आज भी भारत में लगातार लोगों के ईसाई, मुसलमान या बौद्ध बनने की घटनाएं होती रहती हैं और छिटपुट मामलों को छोडकर उन पर कोई उग्र प्रतिक्रिया भी देखने में नहीं आती. भारत के संविधान में भी अपने धर्म के पालन और प्रचार की स्वतंत्रता दी गई है और यह प्रत्येक भारतीय का बुनियादी अधिकार है. भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में इस स्वतंत्रता के बिना लोकतंत्र नहीं चल सकता.

क्योंकि लोकतंत्र में वोटों का महत्व है, इसलिए हर धर्म के बीच ऐसे संगठन बन जाते हैं जो यह प्रचारित करते हैं कि उस धर्म के सभी मानने वालों के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हित एक जैसे हैं और उन्हें वही संगठन पूरा कर सकता है. ये संगठन अंततः सांप्रदायिक प्रचार पर उतर आते हैं जिसकी बुनियाद एक धार्मिक समुदाय को दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की राजनीति पर टिकी होती है. लेकिन ऐसे सांप्रदायिक संगठन भी भारत में अपने विरोधी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता छीनने की बात नहीं करते. यहां सुब्रहमण्यन स्वामी जैसे राजनीतिक नेता मुसलमानों से वोट का अधिकार छीनने जैसी सांप्रदायिक मांग तो उठा सकते हैं, लेकिन उनकी धार्मिक स्वतंत्रता छीनने की मांग उठाने की उनकी भी हिम्मत नहीं पड़ती, क्योंकि आम हिन्दू के लिए इससे बुरी बात कोई नहीं हो सकती कि किसी से उसका धर्म पालन करने का अधिकार छीन लिया जाए.

भारत में रहने वाले ईसाई और मुसलमान भी यहां सदियों से रहते आए हैं और उनमें भी दूसरे धर्म को मानने वालों को अपने धर्म में लाने का वैसा जोश नहीं है जैसा दूसरे देशों में पाया जाता है. अधिकांश भारतीय धर्म को निजी चीज समझते हैं और इस बात में यकीन रखते हैं कि हम अपने धर्म का पालन करें और दूसरों को उनके धर्म का पालन करने दें.

भारतीय राजनीति के लिए भी इसके फलितार्थ हैं. पिछले दिनों ‘घर वापसी' बहुत चर्चा में रही लेकिन यह अभियान --- गैर-हिंदुओं को हिन्दू बनाना --- जल्दी ही टांय-टांय-फिस्स हो गया क्योंकि यह भारतीय समाज की मानसिकता के विरुद्ध है. यह इस बात का संकेत है कि सांप्रदायिक राजनीति --- चाहे वह किसी भी समुदाय की क्यों न हो --- भारतीय समाज में अधिक देर तक प्रभावशाली नहीं रह सकती क्योंकि इसमें रहने वाले अधिकांश लोग धार्मिक स्वतंत्रता के मुरीद हैं.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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