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जर्मन चुनाव

भारत में दम तोड़ते नवजात

भारत में पिछले दशक में शिशुओं की मौत में कमी आई है, लेकिन अभी भी विश्व भर में होने वाली मौतों में भारत का हिस्सा बहुत ही ज्यादा है. भारत को संयुक्त राष्ट्र के सहस्राब्दी लक्ष्य को पूरा करने में लंबा रास्ता तय करना है.

भारत में नवजात शिशुओं की मौतों के मामले में राजधानी दिल्ली पहले नंबर पर है. वहां हर एक हजार में से 30 शिशुओं की मौत हो जाती है. उनमें से 64 फीसदी की मौत जन्म के पहले चार हफ्तों के दौरान ही हो जाती है. देश के चारों महानगरों में सर्वेक्षण के बाद बच्चों के हित में काम करने वाले सेव द चिल्ड्रेन नामक गैर-सरकारी संगठन के अनुसार दुनिया भर में होने वाली नवजात शिशुओं की मौतों में से 29 फीसदी भारत में होती है.

अध्ययन

संगठन ने अपनी रिपोर्ट में नवजात शिशुओं की मौत की समस्या का विस्तार से जिक्र किया है. हालांकि पहले के मुकाबले इन मौतों में गिरावट आई है लेकिन इसके बावजूद अब भी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना है. रिपोर्ट के मुताबिक, जब तक जन्म के चौबीस घंटों के भीतर होने वाली मौतों पर अंकुश नहीं लगाया जाता तब तक यह समस्या गंभीर बनी रहेगी.

संगठन ने कहा है कि अगर समुचित स्वास्थ्य सुविधाएं और प्रसव के दौरान प्रशिक्षित चिकित्साकर्मी मुहैया कराए जाएं तो पहले दिन होने वाली ऐसी आधी मौतें रोकी जा सकती हैं. रिपोर्ट में धनी और गरीब तबके में नवजातों की मौतों के आंकड़े का भी जिक्र किया गया है. इसमें कहा गया है कि देश की आबादी के 20 प्रतिशत धनी तबके में जन्म के पहले महीने के दौरान नवजात शिशुओं की मृत्यु दर 26 प्रति हजार है. लेकिन गरीब परिवारों में यह आंकड़ा 56 यानी दोगुने से भी ज्यादा है.

समस्या

देश में कुपोषण और सभी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी इस समस्या की एक प्रमुख वजह है. बाल रोग विशेषज्ञ डा. रोशन अग्रवाल कहते हैं, "स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता की कमी और कुपोषण के चलते मां के गर्भ में पलने वाला शिशु भी कुपोषण का शिकार हो जाता है. यही वजह है कि कई मामलों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के बावजूद प्रसव के बाद बच्चों को बचाना मुश्किल होता है." वह कहते हैं कि ऐसे मामलों में जन्म के समय शिशु का वजन स्वाभाविक से काफी कम होता है. ऐसे बच्चे आसानी से संक्रमण के शिकार हो जाते हैं.

महिला रोग विशेषज्ञ डा. गौतम खास्तगीर कहते हैं, "नवजात शिशुओं की मौत पर अंकुश लगाने के लिए माता-पिता का भी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना जरूरी है. गर्भावस्था के हर चरण में गर्भस्थ शिशु के विकास की निगरानी जरूरी है. गर्भ में रहने के दौरान शिशु को अगर कोई दिक्कत नहीं हो तो उसके जीवित रहने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है." विशेषज्ञों का कहना है कि खासकर अल्पसंख्यक तबके या गरीब परिवारों में गर्भावस्था के दौरान मां के खान-पान का कोई ध्यान नहीं रखा जाता है. इससे बच्चे के विकास के लिए जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते. नतीजतन जन्म के बाद उसकी मौत की आशंका बढ़ जाती है.

समाधान

तमाम विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी मौतों पर अंकुश लगाने के लिए समाज में बड़े पैमाने पर जागरुकता अभियान चलाना जरूरी है. इससे माता-पिता अपने भावी शिशु के स्वास्थ्य के प्रति सचेत होंगे. साथ ही उनको कुपोषण के खतरों से भी अवगत कराया जाना चाहिए. इसके अलावा प्रसव के समय समुचित स्वास्थ्य सुविधाओं और प्रशिक्षित चिकित्साकर्मियों की उपलब्धता बेहद अहम है.

सेव द चिल्ड्रेन के प्रोगाम मैनेजर जतिन मंदर कहते हैं, "हर मां और शिशु को मुफ्त और बेहतर क्वालिटी की स्वास्थ्य सुविधा और प्रशिक्षत प्रसव सहायक सुलभ होने की स्थिति में नवजात बच्चों की मृत्यु दर को काफी कम किया जा सकता है." विशेषज्ञ डा. आईपी भागवत के अनुसार, "नवजातों की मौत पूरे समाज के लिए किसी सदमे से कम नहीं है. प्रगति के तमाम दावों के बावजूद अब भी 20 हजार नवजात जन्म के पहले सप्ताह के दौरान ही मौत के मुंह में समा जाते हैं. इस पर अंकुश लगाना जरूरी है."

चाइल्ड इन नीड (सिनी) संगठन के डा. समीर चौधरी कहते हैं, "कुपोषण का असर पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है. नवजात बच्ची अगर कुपोषण की शिकार हो तो आगे चल कर मां बनने के स्थिति में उसके बच्चे पर भी खतरा हो सकता है." विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र व राज्य सरकारों और विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों को मिल कर काम करना होगा. अगर देश से पोलियो को खत्म किया जा सकता है तो इस समस्या पर काबू पाना भी असंभव नहीं है.

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

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